पंचांग 2026

पंचांग 2026 · हर महीने का व्रत

एकादशी 2026

Ekadashi 2026

चाँद का ग्यारहवाँ दिन। थाली हल्की, कथा लंबी।

अक्टूबर से दिसंबर 2026 में 6 एकादशी हैं: इंदिरा एकादशी 6 अक्टूबर, मंगलवार को, पापांकुशा एकादशी 22 अक्टूबर, गुरुवार को, रमा एकादशी 5 नवंबर, गुरुवार को, देवउठनी एकादशी 20 नवंबर, शुक्रवार को, उत्पन्ना एकादशी 4 दिसंबर, शुक्रवार को और मोक्षदा एकादशी 20 दिसंबर, रविवार को। देवउठनी एकादशी का अपना पन्ना है। हर एकादशी की तिथि, उसका पारण और उसकी कथा नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।

उस शाम का चाँद, 19 प्रतिशत रोशन

चावल वाले की दुकान का शटर आज आधा ही उठा है।

बोरियाँ बँधी पड़ी हैं। तराज़ू ख़ाली झूल रहा है।

बगल के ठेले पर भीड़ है। केले, अमरूद, एक टोकरी नारियल।

मंदिर की सीढ़ियों पर गीले पाँवों के निशान हैं, नदी से ऊपर तक।

भीतर पुजारी जी तुलसी के पत्ते धोकर एक एक करके थाली में रख रहे हैं।

किसी ने कल रात से कुछ नहीं खाया। किसी ने पानी भी नहीं पिया।

कल सुबह सूरज निकलेगा, तब यह दुकान पूरी खुलेगी।

महीने में दो बार यही सुबह लौटती है। वही तिथि, और हर बार एक नई कथा।

2026 में कब

एकादशी 2026: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

अक्टूबर6 22

नवंबर5 20

दिसंबर4 20

अगले बरस की हर तारीख़: एकादशी 2027

मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar

कोई व्रत, कोई त्योहार अब छूटेगा नहीं

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सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट या कभी एक दिन का फ़र्क़ हो सकता है। शुभ काम का समय अपने पंडित जी से पक्का कर लें।

पहचान

एकादशी क्या है

एकादशी चाँद की ग्यारहवीं तिथि है। हर महीने यह दो बार आती है: एक बार अमावस्या के बाद, शुक्ल पक्ष में, और एक बार पूर्णिमा के बाद, कृष्ण पक्ष में। इसे हरि का दिन कहते हैं, और विष्णु के भक्त इस दिन एक सूरज निकलने से अगले सूरज निकलने तक व्रत रखते हैं। अन्न और दालें नहीं खाई जातीं, और लोक में चावल को तो ख़ास तौर पर मना माना जाता है। व्रत अगली सुबह, द्वादशी को, सूरज निकलने के बाद खोला जाता है। इसे पारण कहते हैं, और हरि वासर नाम की घड़ी में पारण नहीं होता। हर तारीख़ के लिए पारण की घड़ी यह पन्ना ऊपर अपने आप निकालता है। साल में बारह महीने हैं, सो चौबीस एकादशियाँ। जिस साल अधिक मास, यानी लौंद का महीना, जुड़ता है, उसमें दो और आती हैं, पद्मिनी और परमा, और गिनती छब्बीस हो जाती है। इस पन्ने की सूची जनवरी से दिसंबर तक चलती है, इसलिए उसमें पच्चीस नाम हैं: पौष की सफला एकादशी साल के दोनों सिरों पर आती है।

पूरी सूची

अक्टूबर से दिसंबर 2026 की हर एकादशी

हर एकादशी की तारीख़, उसकी तिथि कब से कब तक, उसकी अपनी कथा, और अगले दिन पारण का समय।

  1. 6अक्टूबर

    इंदिरा एकादशी

    आश्विन कृष्ण · एकादशी 6 अक्टूबर, रात 2:08 से 7 अक्टूबर, रात 12:35 तक

    ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा है। माहिष्मती के राजा इंद्रसेन की सभा में नारद आए और बताया कि यमलोक में उन्होंने राजा के पिता को देखा है, जिन्होंने एक बार एकादशी का व्रत बीच में ही तोड़ दिया था, और पिता ने संदेश भेजा है कि बेटा इंदिरा एकादशी रखे। राजा ने परिवार और सेवकों के साथ व्रत रखा; द्वादशी को पारण करते ही आकाश से फूल बरसे, और उसने अपने पिता को गरुड़ पर हरि के धाम जाते देखा।

    पारण: 7 अक्टूबर, सुबह 6:17 से सुबह 8:38 तक

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  2. 22अक्टूबर

    पापांकुशा एकादशी

    आश्विन शुक्ल · एकादशी 21 अक्टूबर, दोपहर 2:12 से 22 अक्टूबर, दोपहर 2:49 तक

    ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसकी कोई अलग कहानी नहीं, कृष्ण की सीख है। इस दिन पद्मनाभ विष्णु की पूजा होती है, और कृष्ण कहते हैं कि सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ भी एकादशी के व्रत के सोलहवें हिस्से के बराबर नहीं। इस एक व्रत से माँ, पिता और पत्नी, तीनों के कुल की दस दस पीढ़ियाँ तर जाती हैं, और इस दिन सोना, तिल, अन्न, पानी, छाता या जूते दान करने वाला यम के घर नहीं जाता।

    पारण: 23 अक्टूबर, सुबह 6:27 से सुबह 8:42 तक

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  3. 5नवंबर

    रमा एकादशी

    कार्तिक कृष्ण · एकादशी 4 नवंबर, सुबह 11:04 से 5 नवंबर, सुबह 10:36 तक

    ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा है। राजा मुचुकुंद की बेटी चंद्रभागा का पति शोभन एकादशी के दिन ससुराल आया, जहाँ उस दिन पशु भी नहीं खाते थे; कमज़ोर शोभन ने फिर भी व्रत रखा, और द्वादशी का सूरज निकलते ही उसके प्राण चले गए। उस पुण्य से उसे मंदराचल पर्वत पर एक राज मिला, पर वह टिकने वाला नहीं था, क्योंकि व्रत श्रद्धा से नहीं रखा गया था। चंद्रभागा ने आठ बरस की उम्र से रखी अपनी सारी एकादशियों का पुण्य उसे दे दिया, और वह राज सदा के लिए उसका हो गया।

    पारण: 6 नवंबर, सुबह 6:37 से सुबह 8:48 तक

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  4. 20नवंबर

    देवउठनी एकादशी

    कार्तिक शुक्ल · इसका अपना पन्ना है

  5. 4दिसंबर

    उत्पन्ना एकादशी

    मार्गशीर्ष कृष्ण · एकादशी 3 दिसंबर, रात 11:04 से 4 दिसंबर, रात 11:45 तक

    यह देवी एकादशी के जन्म की एकादशी है। पद्म पुराण के उत्तर खंड के अड़तीसवें अध्याय में विष्णु के शरीर से निकली कन्या दैत्य मुर को मारती है, और विष्णु उसे एकादशी नाम देकर वर देते हैं कि उसका व्रत पाप मिटाएगा; पूरी कथा ऊपर है। इस्कॉन की कथा इसे मार्गशीर्ष कृष्ण की इसी एकादशी से जोड़ती है, जबकि पद्म पुराण का वह अध्याय किसी महीने का नाम नहीं लेता।

    पारण: 5 दिसंबर, सुबह 6:59 से सुबह 9:04 तक

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  6. 20दिसंबर

    मोक्षदा एकादशी

    मार्गशीर्ष शुक्ल · एकादशी 19 दिसंबर, रात 10:10 से 20 दिसंबर, रात 8:15 तक

    ब्रह्मांड पुराण की कथा है। चंपक नगर के राजा वैखानस ने सपने में अपने पिता को यम के नरक में दुख पाते देखा, और पर्वत मुनि ने ध्यान लगाकर बताया कि पिछले जन्म में पिता ने अपनी पत्नी के साथ बुरा बर्ताव किया था। मुनि के कहने पर राजा ने पूरे परिवार के साथ यह एकादशी रखकर उसका पुण्य पिता को दिया, और देवताओं के दूत पिता को स्वर्ग ले गए; इसीलिए नाम है मोक्षदा, यानी मुक्ति देने वाली। इसी दिन गीता जयंती भी आती है, जिसका अपना पन्ना है।

    पारण: 21 दिसंबर, सुबह 7:10 से सुबह 9:13 तक

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कथा

एकादशी की कथा

एकादशी किसी एक दिन का नाम भर नहीं, एक देवी का नाम भी है। पद्म पुराण के उत्तर खंड के अड़तीसवें अध्याय में कृष्ण युधिष्ठिर को उनके जन्म की कथा सुनाते हैं। तालजंघ नाम के दैत्य का बेटा मुर, जिसे ब्रह्मा के कुल में जन्मा बताया गया है, चंद्रावती नगरी से राज करता था। उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया, और इंद्र, वायु, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य और वरुण की जगह अपने लोग रख दिए।

देवता शिव के पास गए, और शिव ने उन्हें विष्णु के पास भेजा। विष्णु ने बाणों और चक्र से मुर की सेना पर वार किया, पर मुर बचा रहा, और लड़ाई देवताओं के हज़ार बरस तक चली। इस्कॉन की सुनाई कथा में तो मुर की ताक़त से विष्णु के अस्त्र फूल बन जाते हैं। थककर विष्णु बदरिकाश्रम गए और सिंहवती नाम की एक गुफा में सो गए, जो बारह योजन लंबी थी और जिसका बस एक दरवाज़ा था। मुर पीछे पीछे वहाँ भी पहुँच गया, सोते हुए विष्णु को मारने।

तभी विष्णु के शरीर से, उनके तेज के एक अंश से, एक कन्या निकली। मुर ने उसे लड़ने को ललकारा। पद्म पुराण कहता है कि उसने बस एक हुंकार से मुर को मार गिराया; इस्कॉन वाली कथा में वह लड़ती है, उसे बेहोश करती है और उसका सिर काट देती है। विष्णु जागे तो पूछा, यह किसने किया? कन्या बोली, आपकी कृपा से मैंने इस बड़े दैत्य को मारा है। मैं एकादशी हूँ।

विष्णु ने उससे वर माँगने को कहा। एकादशी ने माँगा कि वह सब तीर्थों में सबसे बड़ी हो, मुश्किलें हरे, और जो उसके दिन उपवास करे, या बस रात को एक बार खाए, या दिन में एक ही बार खाए, उसे धर्म, धन और मोक्ष मिले। विष्णु ने हाँ कह दिया। इसी अध्याय में आगे कहा गया है कि पाप मिटाने वाला एकादशी जैसा कोई दूसरा व्रत नहीं, और शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षों की एकादशी बराबर है, उनमें भेद नहीं करना चाहिए।

कहाँ कैसे

एकादशी कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • पंढरपुर, महाराष्ट्र

    वारकरी, यानी वारी करने वाले, औसतन तीन हफ़्ते पैदल चलकर आषाढ़ शुक्ल की एकादशी को पंढरपुर के विट्ठल रुक्मिणी मंदिर पहुँचते हैं। सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पालकियाँ संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की हैं, जिनमें संतों की पादुकाएँ, यानी खड़ाऊँ, चलती हैं। वारी साल में चार बार होती है, चैत्र, माघ, आषाढ़ और कार्तिक में; आषाढ़ी वारी सबसे बड़ी है, और कार्तिक वाली कार्तिकी वारी कहलाती है।

  • इस्कॉन और वैष्णव घर

    इस्कॉन की सूची में छब्बीस एकादशियों के नाम हैं, और आठ से अस्सी बरस तक हर किसी से व्रत की उम्मीद की जाती है। अन्न, दालें, सरसों और हींग नहीं खाए जाते, और दिन हरे कृष्ण नाम जपने, गीता और भागवत पढ़ने और मंदिर जाने में बीतता है।

  • बंगाल

    बंगाल की गौड़ीय वैष्णव परंपरा में यह नियम चैतन्य महाप्रभु से जुड़ता है। बांग्ला की चैतन्य चरितामृत (आदि लीला) में आता है: एक दिन मातार पदे करिया प्रणाम, प्रभु कहे, माता, मोरे देह एक दान। मतलब, एक दिन माँ के पैर छूकर प्रभु बोले, माँ, मुझे एक दान दो; माँ ने हाँ कहा, तो उन्होंने माँगा कि एकादशी को अन्न मत खाना।

  • पुरी, ओड़िशा

    लोक कथा है कि एक एकादशी पर ब्रह्मा महाप्रसाद लेने पुरी आए तो वह ख़त्म हो चुका था; एक पत्ते पर बचे चावल के कुछ दाने एक कुत्ता चाट रहा था, और ब्रह्मा ने उसी के साथ वे दाने खा लिए। तब जगन्नाथ ने कहा कि उनके महाप्रसाद पर एकादशी का नियम नहीं चलेगा, और यहाँ की एकादशी उल्टी एकादशी कहलाने लगी। गौड़ीय परंपरा की पुरानी पोथी प्रेम विवर्त कुछ अलग कहती है: उसमें पुरी में ही चैतन्य महाप्रभु साथियों से कहते हैं कि एकादशी को महाप्रसाद को प्रणाम करो और उसे अगले दिन खाओ।

रीत

एकादशी के दिन क्या करते हैं

  1. दशमी को, यानी एक दिन पहले, बस एक बार खाते हैं। इंदिरा एकादशी की विधि में उस रात ज़मीन पर सोने की बात भी है।
  2. एकादशी की सुबह नहाकर भगवान के आगे व्रत का संकल्प लेते हैं, यानी मन में पक्का करते हैं कि आज व्रत है।
  3. अन्न और दालें नहीं खाई जातीं; इस्कॉन के नियम में सरसों और हींग भी नहीं, और तिल बस षटतिला एकादशी पर।
  4. व्रत हर कोई अपनी ताक़त के हिसाब से रखता है: कोई निर्जल रहता है, कोई बस पानी पर, कोई फल और दूध पर, और कोई बिना अन्न का एक बार का खाना लेता है।
  5. दिन हरि के नाम, गीता और भागवत के पाठ और विष्णु या कृष्ण के मंदिर के दर्शन में जाता है।
  6. रात को जागरण होता है, भजन और कथा के साथ; सफला और आमलकी जैसी कई कथाओं में फल रात भर जागने से ही पूरा होता है।
  7. अगली सुबह, द्वादशी को, सूरज निकलने के बाद और हरि वासर बीत जाने पर पारण होता है; कथाओं की विधि में उससे पहले ब्राह्मण को खिलाने और दान देने की बात है।

सवाल जवाब

एकादशी 2026: पूछे जाने वाले सवाल

एकादशी अक्टूबर से दिसंबर 2026 में कब कब है?

अक्टूबर से दिसंबर 2026 में 6 एकादशी हैं: इंदिरा एकादशी 6 अक्टूबर, मंगलवार को, पापांकुशा एकादशी 22 अक्टूबर, गुरुवार को, रमा एकादशी 5 नवंबर, गुरुवार को, देवउठनी एकादशी 20 नवंबर, शुक्रवार को, उत्पन्ना एकादशी 4 दिसंबर, शुक्रवार को और मोक्षदा एकादशी 20 दिसंबर, रविवार को। देवउठनी एकादशी का अपना पन्ना है। हर एकादशी की तिथि, उसका पारण और उसकी कथा नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।

एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?

क्योंकि एकादशी के व्रत में अन्न छोड़ा जाता है, और चावल भी अन्न है। इस्कॉन के नियम में हर तरह का अन्न और दालें छूटती हैं, और लोक मान्यता में चावल को ख़ास तौर पर मना माना जाता है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद इस नियम से बाहर माना जाता है।

एकादशी का पारण कब करें?

अगले दिन, द्वादशी को, सूरज निकलने के बाद। हरि वासर की घड़ी में पारण मना है; द्रिक पंचांग कहता है कि जो दोपहर तक न रुक सके वह हरि वासर ख़त्म होते ही व्रत खोल सकता है, पर उसके कुछ देर बाद खोलना ज़्यादा ठीक है। इस्कॉन के नियम में बिना अन्न का व्रत अन्न से खुलता है, और निर्जल व्रत दूध या फल से खोला जा सकता है।

एकादशी कैलेंडर में दो दिन क्यों दिखती है?

एकादशी तिथि दिन के किसी भी समय शुरू हो सकती है, इसलिए अक्सर दो तारीख़ों में फैल जाती है। द्रिक पंचांग कहता है कि एक दिन का व्रत पहली तारीख़ को रखना ठीक है, और जिसमें ताक़त हो वह दोनों दिन रख सकता है।

निर्जला एकादशी पर क्या पानी की एक बूँद भी नहीं पीते?

ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा में यह व्रत सूरज निकलने से अगले सूरज तक बिना अन्न और बिना पानी का है। आचमन के लिए दाईं हथेली में बस इतना पानी लिया जा सकता है जिसमें सरसों का एक दाना डूब जाए। अगली सुबह नहाकर, दान देकर और ब्राह्मण को खिलाकर व्रत खुलता है।

एक साल में कितनी एकादशी होती हैं?

हर महीने दो, यानी साल में चौबीस। अधिक मास वाले साल में पद्मिनी और परमा जुड़ जाती हैं और गिनती छब्बीस हो जाती है।

उत्पन्ना एकादशी का क्या महत्व है?

इस्कॉन की कथा में मार्गशीर्ष कृष्ण की इसी एकादशी के साथ वह कथा जुड़ी है जिसमें विष्णु के शरीर से निकली कन्या मुर को मारती है और विष्णु उसे एकादशी नाम देते हैं। उत्पन्ना का मतलब ही है जो जन्मी।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. ISKCON Bangalore: Ekadashi tag (Glories of Saphala, Putrada, Sat-tila, Bhaimi, Vijaya, Amalaki ... Mokshada Ekadashi)हर एकादशी की अपनी कथा, अलग अलग लेखों में, और उत्पन्ना वाली मुर कथा
  2. ISKCON Bangalore: Ekadashi, Dates, Rituals and Significanceव्रत के नियम, क्या नहीं खाते, व्रत के ढंग, पारण किससे करें
  3. Padma Purana, Uttara Khanda, Chapter 38: The Origin of Ekadashi and the Killing of Demon Mura (wisdomlib.org)देवी एकादशी के जन्म और मुर के वध की कथा, उनके वरदान
  4. The Gaudiya Treasures of Bengal: Chaitanya Mahaprabhu on Ekadashiचैतन्य चरितामृत का माँ से दान माँगने वाला प्रसंग, प्रेम विवर्त की पुरी वाली बात
  5. Drik Panchang: Ekadashi Vrat Mahatmyaसाल में चौबीस एकादशी, अधिक मास में पद्मिनी और परमा मिलाकर छब्बीस
  6. Drik Panchang: Ekadashi Fasting FAQदो दिन की एकादशी, पारण और हरि वासर
  7. Scroll.in: As Covid-19 puts curbs on Pandharpur pilgrimage, recalling the devotion to the poet-saint traditionपंढरपुर की वारी, ज्ञानेश्वर और तुकाराम की पालकियाँ, साल की चार वारियाँ
  8. Jagran English: Jagannath Puri is the only temple where rice is consumed on Ekadashiपुरी के महाप्रसाद और उल्टी एकादशी की लोक कथा, चावल वाली लोक मान्यता

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2026 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।