पंचांग 2026 · कार्तिक शुक्ल नवमी
अक्षय नवमी 2026
Akshaya Navami 2026
तुलसी भी, बेल भी। दोनों एक ही पेड़ में मिल गए।
अक्षय नवमी 2026 में 18 नवंबर, बुधवार को है। कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि 18 नवंबर, सुबह 6:06 से 19 नवंबर, सुबह 7:07 तक है। सुबह की पूजा का समय (प्रातः काल) सुबह 6:46 से सुबह 8:54 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
सफ़ेद धागा तने के चारों ओर घूमता है। एक फेरा। दो। सात।
आँवले का पेड़। छोटी छोटी पत्तियाँ, धूप उनमें से छनकर नीचे आती है।
जड़ में थोड़ा जल। थोड़ा कच्चा दूध।
पास ही चूल्हा जल रहा है। आज खाना यहीं पकेगा, इसी छाँव में।
एक बच्चा गिरा हुआ आँवला उठाकर दाँत से काटता है। मुँह बनाता है। फिर पानी पीता है, और हैरान रह जाता है: पानी मीठा लगता है।
दादी कहती हैं, आज जो दोगे, वह कभी घटेगा नहीं। इसीलिए नाम अक्षय।
और कथा शुरू होती है लक्ष्मी से, जो धरती पर घूमते हुए एक उलझन में पड़ गई थीं।
2026 में कब
अक्षय नवमी 2026: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़18 नवंबर, बुधवार
तिथिकार्तिक शुक्ल नवमी18 नवंबर, सुबह 6:06 से 19 नवंबर, सुबह 7:07 तक
नक्षत्रशतभिषासूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 6:46
सूर्यास्तशाम 5:26
चंद्रोदयदोपहर 1:19
- प्रातः काल
- सुबह 6:46 से सुबह 8:54 तकसूर्योदय के बाद दिन का पहला पाँचवाँ हिस्सा।
अगले बरस अक्षय नवमी 7 नवंबर 2027, रविवार को है: अक्षय नवमी 2027, तारीख़ और मुहूर्त
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शुभकामना
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पहचान
अक्षय नवमी क्या है
अक्षय नवमी कार्तिक के शुक्ल पक्ष की नवमी को आती है, दिवाली के नौ दिन बाद। इसे आँवला नवमी और कुष्मांड नवमी भी कहते हैं, और ओड़िशा में अँला नवमी। अक्षय यानी जो कभी घटे नहीं: मान्यता है कि इस दिन किए दान, पूजा और भले काम का फल कभी कम नहीं होता। मान्यता यह भी है कि सतयुग इसी दिन शुरू हुआ, इसलिए इसे सत्य युगादि भी कहते हैं; कुछ लोग इसे द्वापर युग की शुरुआत से भी जोड़ते हैं। इस दिन आँवले के पेड़ की पूजा और परिक्रमा होती है, और उसकी छाँव में खाना पकाकर पूरा परिवार साथ खाता है। मथुरा वृंदावन की परिक्रमा इस दिन बहुत बड़ी मानी जाती है। पुरानी रीत कहती है कि इस व्रत के लिए वह नवमी लें जो दोपहर तक रहे। इसी दिन बंगाल में जगद्धात्री पूजा होती है।
कथा
अक्षय नवमी की कथा
लोक में जो कथा सुनाते हैं, वह लक्ष्मी की है। एक बार लक्ष्मी धरती पर घूमने आईं। उनके मन में आया कि आज विष्णु और शिव, दोनों की पूजा एक साथ करूँ। पर कैसे? विष्णु को तुलसी प्यारी है, और शिव को बेल। लक्ष्मी सोचती रहीं, और फिर उन्हें सूझा: आँवले के पेड़ में तुलसी और बेल, दोनों के गुण एक साथ हैं। तो उन्होंने आँवले के पेड़ को ही विष्णु और शिव का रूप मानकर उसकी पूजा की।
पूजा से ख़ुश होकर विष्णु और शिव, दोनों प्रकट हुए। लक्ष्मी ने उसी आँवले के पेड़ के नीचे खाना पकाया, और पहले दोनों को परोसा। फिर वही खाना प्रसाद मानकर ख़ुद खाया। वह दिन कार्तिक शुक्ल नवमी का था। कहते हैं, तभी से इस दिन आँवले की पूजा और उसकी छाँव में खाने की रीत चली आ रही है।
दूसरा नाम, कुष्मांड नवमी, एक और कथा से आता है। कहते हैं, विष्णु ने कुष्मांडक नाम के एक दैत्य को मारा था, और उसके रोओं से कुष्मांड की बेल उगी, यानी पेठे या कद्दू की। इसीलिए इस दिन पेठे का दान बहुत अच्छा माना जाता है। ब्रज में एक और बात कही जाती है: कंस को मारने से पहले कृष्ण ने इसी दिन वन की तीन परिक्रमाएँ कीं और ग्वाल बालों और ब्रज के लोगों को इकट्ठा किया, और अगले दिन, दशमी को, कंस का अंत हुआ। इसी याद में लोग आज भी इस दिन मथुरा वृंदावन की परिक्रमा करते हैं, झूठ पर सच की जीत को याद करके।
ओड़िशा के साक्षीगोपाल मंदिर की कथा इस दिन को एक और रंग देती है। पहले उस मंदिर में राधा की मूर्ति नहीं थी। कहते हैं, पुजारी की बेटी लखमी ने, जिसे लोग राधा का ही रूप मानते थे, कहा कि गोपाल को राधा के बिना पूजना ठीक नहीं। तब उत्तर भारत से राधा की मूर्ति लाई गई। पहले उसे घाघरा चोली पहनाई गई। फिर जब उसे ओड़िशा की साड़ी पहनाई गई, तो उसके पैर दिखने लगे, और पुजारियों ने इसे शुभ संकेत माना। तब से आँवला नवमी ही वह एक दिन है जब राधा के पैरों के दर्शन होते हैं।
व्रत
अक्षय नवमी का व्रत कैसे रखें
- सुबह जल्दी नहाकर, साफ़ कपड़े पहनकर, आँवले के पेड़ के पास पूजा और व्रत का संकल्प लेते हैं।
- पुरानी रीत कहती है कि इस दिन मन और इंद्रियों को क़ाबू में रखें।
- बहुत सी औरतें पूजा पूरी होने तक व्रत रखती हैं, या बस सादा खाना लेती हैं।
- पूजा में "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करते हुए विष्णु से घर के सुख और सेहत की प्रार्थना करते हैं।
- कई जगह सुबह विष्णु सहस्रनाम और कार्तिक पुराण पढ़ते हैं, और दिन में भजन कीर्तन होते हैं।
पारण: व्रत कैसे खोलें
अक्षय नवमी के व्रत को खोलने का कोई अलग तय नियम नहीं मिलता। जो औरतें व्रत रखती हैं, वे आँवले की पूजा पूरी होने तक नहीं खातीं, या बस सादा खाना लेती हैं। पूजा के बाद पेड़ के नीचे पका खाना पहले भगवान को चढ़ता है, फिर पूरा परिवार उसे उसी छाँव में खाता है, जैसे कथा में लक्ष्मी ने पहले विष्णु और शिव को परोसकर फिर ख़ुद प्रसाद लिया था। यही इस दिन का पहला खाना होता है। साथ में दान होता है: आँवला, अनाज, पेठा, गरम कपड़े।
कहाँ कैसे
अक्षय नवमी कहाँ कैसे मनाया जाता है
मथुरा और वृंदावन
इस दिन मथुरा वृंदावन की परिक्रमा बहुत बड़ी मानी जाती है, और बहुत भीड़ होती है। दूर दूर से, पंजाब और दिल्ली तक से, लोग इस दिन ब्रज पहुँचते हैं।
साक्षीगोपाल, पुरी ज़िला
सत्यवादी के साक्षीगोपाल मंदिर में साल में बस इसी दिन राधा पद दर्शन होता है, यानी राधा के पैरों के दर्शन। मान्यता है कि ये दर्शन मोक्ष देते हैं, और हज़ारों लोग आते हैं।
संबलपुर, ओड़िशा
सुबह विष्णु सहस्रनाम और कार्तिक पुराण का पाठ होता है, विष्णु का आँवलों से अभिषेक होता है, और लोग दिन भर पेड़ के नीचे रहकर दीया जलाते हैं और उसके सात फेरे लेते हैं। रूपापली गाँव में सुबह से भीड़ जुटती है।
तेलुगु घर
कार्तिक में आँवले के पेड़ के नीचे परिवार के साथ खाना खाने की रीत को यहाँ वन भोजनालु कहते हैं, यानी वन का भोजन।
उत्तर भारत
यहाँ यह पूजा ज़्यादा होती है, और औरतें इसे बच्चों के सुख और अच्छी सेहत के लिए करती हैं।
बंगाल
इसी दिन बंगाल में जगद्धात्री पूजा होती है, देवी जगद्धात्री की, जिनकी अपनी अलग कथा और रीत है।
रीत
अक्षय नवमी के दिन क्या करते हैं
- सुबह पास के किसी आँवले के पेड़ के आसपास की ज़मीन बुहारकर उस पर जल छिड़कते हैं।
- पेड़ के नीचे पूरब की ओर मुँह करके जड़ में जल और थोड़ा कच्चा दूध चढ़ाते हैं, और तने पर हल्दी और कुमकुम लगाते हैं।
- फूल, अक्षत, रोली, धूप और दीया चढ़ाकर पूजा करते हैं।
- तने पर रुई या रक्षा सूत लपेटते हुए पेड़ की परिक्रमा करते हैं, घर की रीत से सात या एक सौ आठ फेरे।
- आख़िर में आँवले की आरती उतारते हैं, और परिवार के सुख के लिए प्रार्थना करते हैं।
- पेड़ के नीचे खाना पकाते हैं, पहले भगवान को चढ़ाते हैं, और फिर पूरा परिवार उसी छाँव में साथ खाता है।
- ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को खाना खिलाते हैं, और आँवला, अनाज, गरम कपड़े या पैसे दान करते हैं।
- कुष्मांड, यानी पेठा, गंध, फूल और अक्षत से पूजकर दान करते हैं; और अगर पूरा पेड़ न मिले, तो आँवले की डाली या गमले के पौधे की पूजा कर लेते हैं।
रसोई
अक्षय नवमी का खाना
- आँवला इस दिन का फल, जो विष्णु को प्यारा माना जाता है; दान में भी देते हैं।
- पेड़ के नीचे पका सादा खाना पहले भोग, फिर परिवार का साझा खाना।
- पेठा, यानी कुष्मांड इस दिन पूजकर दान करते हैं।
सवाल जवाब
अक्षय नवमी 2026: पूछे जाने वाले सवाल
अक्षय नवमी 2026 कब है?
अक्षय नवमी 2026 में 18 नवंबर, बुधवार को है। कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि 18 नवंबर, सुबह 6:06 से 19 नवंबर, सुबह 7:07 तक है। सुबह की पूजा का समय (प्रातः काल) सुबह 6:46 से सुबह 8:54 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
अक्षय नवमी को आँवले की पूजा क्यों होती है?
कथा है कि लक्ष्मी विष्णु और शिव को एक साथ पूजना चाहती थीं। आँवले में तुलसी और बेल, दोनों के गुण मिलते हैं, इसलिए उन्होंने आँवले को दोनों का रूप मानकर पूजा। यह भी माना जाता है कि कार्तिक में विष्णु आँवले के पेड़ में रहते हैं।
अक्षय नवमी का मतलब क्या है?
अक्षय यानी जो कभी घटे नहीं। मान्यता है कि इस दिन किए दान, पूजा और भले काम का फल कभी कम नहीं होता।
आँवले का पेड़ न मिले तो क्या करें?
आँवले की एक डाली या गमले में लगे पौधे की पूजा करके उसके पास खाना खा सकते हैं।
क्या अक्षय नवमी पर व्रत रखते हैं?
बहुत सी औरतें आँवले की पूजा पूरी होने तक व्रत रखती हैं या सादा खाना लेती हैं, फिर पेड़ के नीचे पका खाना प्रसाद की तरह खाती हैं।
इसे कुष्मांड नवमी क्यों कहते हैं?
कहते हैं, विष्णु ने इसी दिन कुष्मांडक दैत्य को मारा था और उसके रोओं से पेठे की बेल उगी। इसलिए इस दिन पेठे का दान अच्छा माना जाता है।
राधा पद दर्शन क्या है?
ओड़िशा के साक्षीगोपाल मंदिर में राधा के पैर साल भर ढके रहते हैं। बस आँवला नवमी के दिन उनके दर्शन होते हैं, और मान्यता है कि ये दर्शन मोक्ष देते हैं।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Drik Panchang: Akshaya Navamiतिथि का नियम, सतयुग, आँवले की पूजा, मथुरा वृंदावन परिक्रमा, अक्षय फल, जगद्धात्री पूजा
- Bhakti Bharat: आंवला नवमीलक्ष्मी की कथा, तुलसी और बेल, पूजा विधि, पेड़ के नीचे भोजन, बच्चों के सुख के लिए, उत्तर भारत
- Bharatdiscovery: अक्षय नवमीद्वापर वाली मान्यता, दोपहर तक की नवमी, जितेंद्रिय रहना, कुष्मांडक दैत्य, कुष्मांड दान, कृष्ण की तीन परिक्रमाएँ, मथुरा वृंदावन परिक्रमा
- PanchangBodh: अक्षय नवमीआँवला और कुष्मांड नवमी नाम, रक्षा सूत, ब्राह्मणों को भोजन, डाली या गमले का पौधा
- Odisha Bytes: Anla Navami rituals and beliefsसंबलपुर के रीत, सात फेरे, सत्य युगादि, साक्षीगोपाल की राधा मूर्ति की कथा, पेड़ के नीचे पका नैवेद्य
- Odisha Bytes: Radha Pada Darshan at Sakhigopalराधा पद दर्शन, बस एक दिन, मोक्ष की मान्यता, दिवाली के नौ दिन बाद
- HinduTone: Akshaya Navami (Amla Navami)पूजा के क्रम, सात या एक सौ आठ फेरे, पूजा तक व्रत, वासुदेव मंत्र, दान, वन भोजनालु, मथुरा की भीड़
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2026 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।