पंचांग 2026 · कार्तिक शुक्ल अष्टमी
गोपाष्टमी 2026
Gopashtami 2026
उस सुबह कान्हा ने बछड़े छोड़े, और गायें हाँकीं।
गोपाष्टमी 2026 में 17 नवंबर, मंगलवार को है। कार्तिक शुक्ल अष्टमी तिथि 17 नवंबर, सुबह 4:20 से 18 नवंबर, सुबह 6:06 तक है। सुबह की पूजा का समय (प्रातः काल) सुबह 6:45 से सुबह 8:53 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
घुँघरुओं की आवाज़ पहले आती है। गायें बाद में।
सींगों पर चुनरी का पट्टा। माथे पर रोली।
एक बच्चा हथेली पर गुड़ रखकर आगे करता है। खुरदुरी जीभ। वह हँसकर हाथ खींच लेता है।
गौशाला के फ़र्श पर रंगोली है, जिस पर अभी कोई खुर पड़ने वाला है।
एक दादी झुकती हैं। गाय के पैरों की धूल उठाकर माथे से लगाती हैं।
शाम को गायें लौटेंगी, धूल उड़ाती हुई। उसी धूल वाली घड़ी में फिर दीया जलेगा।
कहते हैं, ब्रज में एक छोटा लड़का इसी दिन पहली बार बछड़ों को नहीं, गायों को लेकर वन गया था।
2026 में कब
गोपाष्टमी 2026: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़17 नवंबर, मंगलवार
तिथिकार्तिक शुक्ल अष्टमी17 नवंबर, सुबह 4:20 से 18 नवंबर, सुबह 6:06 तक
नक्षत्रधनिष्ठासूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 6:45
सूर्यास्तशाम 5:27
चंद्रोदयदोपहर 12:49
- प्रातः काल
- सुबह 6:45 से सुबह 8:53 तकसूर्योदय के बाद दिन का पहला पाँचवाँ हिस्सा।
अगले बरस गोपाष्टमी 6 नवंबर 2027, शनिवार को है: गोपाष्टमी 2027, तारीख़ और मुहूर्त
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पहचान
गोपाष्टमी क्या है
गोपाष्टमी कार्तिक के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को आती है, गोवर्धन पूजा के सात दिन बाद। इस दिन गाय और बछड़ों की पूजा होती है। पद्म पुराण के कार्तिक माहात्म्य में लिखा है कि इसी दिन से कृष्ण गोप बने, यानी गायें चराने वाले; उससे पहले वे वत्सप थे, यानी बस बछड़े चराते थे। भागवत में भी आता है कि उम्र का अगला पड़ाव आने पर ब्रज के ग्वालों ने कृष्ण और बलराम को गायें चराने लायक़ मान लिया। लोग सुबह गाय बछड़ों को नहलाते सजाते हैं, उनकी पूजा और परिक्रमा करते हैं, और शाम को जब गायें लौटती हैं तो फिर पूजा होती है। इस दिन व्रत भी रखते हैं, और गौशालाओं को दान देते हैं। सबसे बड़ी गोपाष्टमी ब्रज में होती है: मथुरा, वृंदावन और बरसाना में। दक्षिण के कुछ पंचांग इस दिन को गोष्ठाष्टमी भी लिखते हैं।
कथा
गोपाष्टमी की कथा
पद्म पुराण के कार्तिक माहात्म्य में यह दिन ऐसे बताया गया है: "शुक्लाष्टमी कार्त्तिके तु स्मृता गोपाष्टमी बुधैः। तद्दिनाद्वासुदेवोऽभूद्गोपः पूर्वं तु वत्सपः॥" यानी कार्तिक के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को ज्ञानी लोग गोपाष्टमी कहते हैं। उसी दिन से वासुदेव गोप बने, गायें चराने वाले; उससे पहले वे बछड़े चराते थे। भागवत के दसवें स्कंध (अध्याय पंद्रह) में शुकदेव कहते हैं: "ततश्च पौगण्डवयःश्रितौ व्रजे बभूवतुस्तौ पशुपालसम्मतौ।" यानी जब दोनों भाई बचपन से आगे की उम्र में आए, तो ब्रज के ग्वालों ने उन्हें गायें चराने की इजाज़त दे दी, और वे सखाओं के साथ गायें चराते हुए अपने पैरों से वृंदावन को और भी पवित्र करने लगे।
घरों में यह कथा ऐसे कहते हैं। कान्हा छह बरस के हुए तो एक दिन मैया से ज़िद पकड़ ली: अब मैं बछड़े नहीं, गायें चराऊँगा। यशोदा ने बहुत समझाया, पर कान्हा नहीं माने। हारकर यशोदा ने उन्हें नंद बाबा के पास भेज दिया। नंद बाबा ने शांडिल्य ऋषि से पूछा कि गाय चराने भेजने का शुभ मुहूर्त कब है। ऋषि ने गिनती की और बोले: बस यही दिन है। आज न भेजा, तो अगले बरस तक कोई मुहूर्त नहीं। वह दिन कार्तिक शुक्ल अष्टमी का था।
यशोदा ने कान्हा को सजाया: सिर पर मोर मुकुट, पैरों में घुँघरू। फिर पैरों के लिए पादुकाएँ लाईं। कान्हा ने पैर पीछे खींच लिए और बोले: मैया, अगर मेरी गायें नंगे पाँव चलेंगी, तो मैं भी नंगे पाँव चलूँगा। उनके पैरों में भी पादुका बाँधो, तब पहनूँगा। कहते हैं, गायों से इसी प्यार के कारण उनका नाम पड़ा गोपाल और गोविंद।
गोविंद नाम की एक और कथा भी इसी दिन से जुड़ती है। कृष्ण के कहने पर ब्रज ने इंद्र की पूजा छोड़ी, तो इंद्र ने सात दिन तक पानी बरसाया, और कृष्ण गोवर्धन को अपनी छोटी उँगली पर उठाए रहे। मान्यता है कि गोपाष्टमी के दिन इंद्र ने हार मानी। विष्णु पुराण (पाँचवाँ अंश, बारहवाँ अध्याय) में इंद्र कहते हैं: "स त्वां कृष्णाभिषेक्ष्यामि गवां वाक्यप्रचोदितः। उपेन्द्रत्वे गवामिन्द्रो गोविन्दस्त्वं भविष्यसि॥" यानी गायों के कहने पर मैं तुम्हारा अभिषेक उपेंद्र के पद पर करूँगा; तुम गायों के इंद्र हो, इसलिए तुम गोविंद कहलाओगे। ब्रज की एक लोक कथा यह भी कहती है कि राधा भी गायें चराने वन जाना चाहती थीं, पर लड़की होने के कारण उन्हें जाने नहीं दिया जाता था। राधा कृष्ण के सखा सुबल जैसी दिखती थीं, तो उन्होंने उसके कपड़े पहने, ग्वाले का रूप धरा, और कृष्ण के साथ वन चली गईं।
व्रत
गोपाष्टमी का व्रत कैसे रखें
- सुबह नहाकर साफ़ कपड़े पहनते हैं और गौ पूजा और व्रत का संकल्प लेते हैं।
- इस दिन व्रत रखते हैं, पर उसका कोई एक तय नियम नहीं है; हर घर अपनी रीत मानता है।
- घर में पूजा की जगह गोबर, फूलों, दीयों और रंगोली से सजाकर कृष्ण और गौमाता की मूर्ति या तस्वीर रखते हैं।
- गौ पूजा में यह मंत्र पढ़ते हैं: "लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता। घृतं वहति यज्ञार्थं मम पापं व्यपोहतु॥" यानी जो लक्ष्मी गाय के रूप में रहती हैं और यज्ञ के लिए घी देती हैं, वे मेरे पाप दूर करें।
- "गोमाता की जय" और "गोपाल गोविंद जय जय" बोलते हुए गाय की आरती और परिक्रमा करते हैं, और सुबह की पूजा पूरी होती है।
- दिन में औरतें कृष्ण की पूजा करती हैं, और भजन कीर्तन चलते हैं।
- शाम को गायों के लौटने पर पंचोपचार पूजा होती है, यानी पाँच चीज़ों से पूजा, और उन्हें फिर कुछ खिलाते हैं।
पारण: व्रत कैसे खोलें
गोपाष्टमी पर व्रत रखते हैं, पर उसे कब और किस चीज़ से खोलें, इसका कोई एक तय नियम नहीं मिलता; हर घर अपनी रीत मानता है। दिन की आख़िरी पूजा शाम को होती है, गोधूलि में, जब गायें चरकर लौटती हैं। जिनके घर गाय नहीं, वे इस दिन गौशाला में चारा, गुड़ या खाने का सामान दान करते हैं।
कहाँ कैसे
गोपाष्टमी कहाँ कैसे मनाया जाता है
मथुरा, वृंदावन और बरसाना
ब्रज में गोपाष्टमी सबसे बड़ी होती है। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर और वृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में भारी भीड़ होती है, और गौशालाओं में गौ पूजा, भजन और कीर्तन होते हैं।
नाथद्वारा, राजस्थान
श्रीनाथजी के मंदिर में भी लोग यह दिन पूरे मन से मनाते हैं।
गुरुवायूर, केरल
गुरुवायूरप्पन के मंदिर में भी गोपाष्टमी की पूजा होती है।
महाराष्ट्र
यहाँ गाय और बछड़े की ऐसी ही पूजा गोवत्स द्वादशी को होती है, जो अलग दिन पड़ती है।
शहर और गाँव की गौशालाएँ
जिनके घर गाय नहीं, वे गौशाला जाकर गंगाजल और फूल चढ़ाते हैं, दीया जलाते हैं, गायों को गुड़ खिलाते हैं, और खाना या सामान दान करते हैं। कई जगह लोग गौशाला के पास मिलकर खाना भी खाते हैं।
रीत
गोपाष्टमी के दिन क्या करते हैं
- सुबह घर और गौशाला साफ़ करते हैं, और गौशाला को रंगोली और फूलों से सजाते हैं।
- गाय और बछड़ों को नहलाते हैं, पैरों में घुँघरू पहनाते हैं, सींगों पर चुनरी का पट्टा बाँधते हैं, और उन्हें कपड़ों और मालाओं से सजाते हैं।
- सींगों पर हल्दी और कुमकुम, और माथे पर तिलक लगाते हैं।
- गायों को गुड़, हरा चारा, हरी मटर, गेहूँ, फल, पंचामृत और पानी देते हैं; आरती के बाद ताज़ी हरी घास।
- गाय के चरण छूते हैं, और जब गायें चरने निकलती हैं तो लोग कुछ दूर उनके पीछे पीछे चलते हैं।
- ग्वालों को दान देते हैं; कई लोग उन्हें नए कपड़े देकर तिलक लगाते हैं।
- शाम को गायें लौटती हैं, और उस घड़ी को गोधूलि कहते हैं; तब लोग गाय के पैरों की धूल माथे से लगाकर हाथ जोड़ते हैं।
रसोई
गोपाष्टमी का खाना
- गुड़ और हरी मटर शाम को लौटी गायों का ख़ास खाना।
- हरा चारा, गेहूँ और फल सुबह की पूजा में गाय को चढ़ने वाली चीज़ें।
- गौशाला का साझा खाना कई जगह पूजा के बाद लोग गौशाला के पास मिलकर खाते हैं।
सवाल जवाब
गोपाष्टमी 2026: पूछे जाने वाले सवाल
गोपाष्टमी 2026 कब है?
गोपाष्टमी 2026 में 17 नवंबर, मंगलवार को है। कार्तिक शुक्ल अष्टमी तिथि 17 नवंबर, सुबह 4:20 से 18 नवंबर, सुबह 6:06 तक है। सुबह की पूजा का समय (प्रातः काल) सुबह 6:45 से सुबह 8:53 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
गोपाष्टमी क्यों मनाई जाती है?
मान्यता है कि इसी दिन नंद बाबा ने कृष्ण और बलराम को पहली बार गायें चराने भेजा था। पद्म पुराण कहता है कि इसी दिन से कृष्ण बछड़े चराने वाले से गायें चराने वाले बने।
गोपाष्टमी पर गाय को क्या खिलाएँ?
गुड़, हरा चारा, हरी मटर, गेहूँ और फल। सुबह की पूजा में पंचामृत और पानी भी, और आरती के बाद ताज़ी हरी घास।
घर में गाय न हो तो गोपाष्टमी कैसे करें?
पास की गौशाला जाकर गंगाजल और फूल चढ़ाएँ, दीया जलाएँ, गायों को गुड़ खिलाएँ, और चारा या खाने का सामान दान करें।
क्या गोपाष्टमी पर व्रत रखते हैं?
हाँ, इस दिन व्रत रखते हैं। पर उसका कोई एक तय नियम नहीं है; हर घर अपनी रीत से रखता है।
गोवर्धन पूजा और गोपाष्टमी का क्या रिश्ता है?
गोपाष्टमी गोवर्धन पूजा के सात दिन बाद आती है। मान्यता है कि सात दिन की बारिश के बाद इसी दिन इंद्र ने हार मानी और कृष्ण को गोविंद कहा।
गोधूलि का समय क्या होता है?
शाम की वह घड़ी जब गायें चरकर लौटती हैं और उनके खुरों से धूल उड़ती है। गोपाष्टमी पर इसी समय गायों की फिर से पूजा होती है।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Bhagavata Purana 10.15.1 with purport (Vedabase)भागवत का श्लोक, और पद्म पुराण के कार्तिक माहात्म्य का गोपाष्टमी वाला श्लोक
- Shlokam: Srimad Bhagavatam Canto 10, Chapter 15भागवत 10.15.1 का देवनागरी पाठ
- Bhakti Bharat: गोपाष्टमीछह बरस के कान्हा की ज़िद, शांडिल्य ऋषि, पादुकाएँ, इंद्र, राधा, विष्णु पुराण का श्लोक, गौ मंत्र, पूजा विधि, गौशाला
- Bhakti Bharat: Gopashtami (English)गोवर्धन पूजा के सात दिन बाद, सुबल, गोवत्स द्वादशी, बरसाना, नाथद्वारा, गायों का खाना
- ISKCON Delhi: Gopashtamiबछड़ों से गायों तक, नंद, परिक्रमा और पीछे चलना, गोधूलि, गौशाला को दान
- HinduPad: Gopashtamiगोष्ठाष्टमी नाम, मथुरा, वृंदावन और गुरुवायूर के मंदिर, गायों को सजाना
- Patrika: गोपाष्टमी का महत्वव्रत रखा जाता है, शाम की पंचोपचार पूजा, पैरों की धूल माथे पर
- Navbharat Live: गोपाष्टमीसंकल्प, पूजा की जगह की सजावट, गाय को चढ़ने वाली चीज़ें, जयकारे, आरती और परिक्रमा, ब्रज
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2026 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।