पंचांग 2027

मनु विश्रांति दर्शन की पहली किताब: अक्षरों का नक़्शा

बीजसेतु

कुंडलिनी, बीज मंत्र और आवाज़ का सच: एक साधक का शोध

साढ़े चार सौ साल पुराने एक चित्र में छिपा राज़, और उसका प्रमाण

बीजसेतु मनु विश्रांति की हिंदी किताब है, कुंडलिनी के चक्रों के उस चित्र पर जो सदियों से बनता आया है: छह कमलों की पचास पंखुड़ियों पर लिखी पूरी वर्णमाला, और कमलों के बीच पाँच बीज मंत्र, लं, वं, रं, यं, हं। बारह अध्याय हैं, और हर हिस्सा एक चक्र है, मूलाधार से सहस्रार तक।

बीजसेतु का कवर: गहरे नीले पर पाँच घेरे, नीचे से ऊपर के पाँच कमल, उन पर पंखुड़ियों के अक्षर, और सुनहरे अक्षरों में पाँच बीज

पीछे के कवर से

बीजसेतु आपको क्या सिखाती है

चक्रों का चित्र आपने कहीं न कहीं देखा है। यह किताब आपको उसे पढ़ना सिखाती है।

पचास पंखुड़ियों पर पूरी वर्णमाला लिखी है, गले से उतरकर जड़ तक। और पाँचों बीज, लं, वं, रं, यं, हं, अपने कमल पर नहीं, दूसरे कमलों की पंखुड़ियों पर लिखे हैं। यह संयोग नहीं, नक़्शे का गणित है, जिसे आप काग़ज़ और पेंसिल से ख़ुद जाँच सकेंगे।

आप जानेंगे कि हर बीज अपने तत्व का ही अक्षर क्यों है, मंत्र शरीर में किस रास्ते चलता है, ॐ कहाँ ठहरता है, और बोली कहाँ पूरी होकर चुप हो जाती है। हर पड़ाव पर साधक के लिए एक छोटा, सुरक्षित अभ्यास है।

पचास पंखुड़ियाँ, पाँच बीज, और एक भी अपने घर में नहीं।

अनुक्रम

बीजसेतु के बारह अध्याय, मूलाधार से सहस्रार तक

12 अध्याय, 7 हिस्सों में। हर हिस्सा एक चक्र है, नीचे से ऊपर; चक्र के नाम पर उसका अपना पन्ना खुलता है।

  • भूमिका
  • प्रवेश: राम और समुद्र
  1. खंड 1

    मूलाधार: राज़

    जहाँ नक़्शा खुलता है

    1. 1पाँचों बीज अपने कमल पर नहीं, दूसरे कमलों पर लिखे हैं
    2. 2पचास पंखुड़ियों में पूरी वर्णमाला छिपी है
  2. खंड 2

    स्वाधिष्ठान: नियम

    जहाँ नियम दिखता है

    1. 3हर बीज वही अक्षर है जो उसके तत्व का अक्षर है
    2. 4बीज बेघर होंगे ही, यह संयोग नहीं, गणित है
  3. खंड 3

    मणिपूर: जन्म

    जहाँ बीज जन्म लेते हैं

    1. 5चारों बीज गले के कमल से उतरे हैं
    2. 6हर स्वर बीज बनकर अपने तत्व की माँ का नाम लेता है
  4. खंड 4

    अनाहत: रोशनी

    जहाँ पुरानी रोशनियाँ मिलती हैं

    1. 7चाँद गले पर, सूरज हृदय पर, आग जड़ में लिखी है
  5. खंड 5

    विशुद्ध: मंत्र

    जहाँ मंत्र चलता है

    1. 8हर मंत्र शरीर में अपना रास्ता खींचता है
    2. 9ॐ भी अपने घर में नहीं
  6. खंड 6

    आज्ञा: सीमा

    जहाँ बोली रुकती है

    1. 10भूतशुद्धि में बीज हुक्म नहीं देते, रास्ता दिखाते हैं
    2. 11बोली गले पर पूरी हो जाती है, आज्ञा उससे ऊपर है
  7. समापन

    सहस्रार: सेतु

    जहाँ हर अक्षर घर लौटता है

    1. 12सहस्रार पर कोई बेघर नहीं
  • परिशिष्ट 1: तरीक़ा और आँकड़े
  • परिशिष्ट 2: प्रमेय और पक्के नियम
  • शब्दकोश
  • ग्रंथ सूची
  • टिप्पणियाँ
  • जाँच जारी
  • अनुक्रमणिका

बीजसेतु की भूमिका

चक्रों का चित्र, जिसे सबने देखा पर पढ़ा कम

कुंडलिनी के चक्रों का चित्र आज भारत के लगभग हर घर तक पहुँच चुका है। सात रंगीन कमल, पंखुड़ियों पर लिखे अक्षर, और हर कमल के बीच में एक बीज। हम इस चित्र को सदियों से देखते आए हैं। पढ़ा बहुत कम है।

यह किताब उसी चित्र को पढ़ने का मेरा शोध है।

पढ़ना शुरू किया तो पहली ही पंक्ति पर नज़र अटक गई। धरती का बीज लं है, पर ल धरती के कमल पर नहीं, जल के कमल पर लिखा है। जल का बीज वं है, और व धरती के कमल पर। पाँच तत्व, पाँच बीज, और एक भी अपने घर में नहीं। हर बीज किसी दूसरे कमल की पंखुड़ी पर रखा है, जैसे अपने घर की चाबी पड़ोसी के पास छोड़ दी गई हो।

साढ़े चार सौ साल से यह चित्र इसी तरह लिखा जा रहा है, और यह मेल उसमें चुपचाप छिपा है। मुझे यह संयोग नहीं लगा। और जब इसे गणित पर कसा, तो यह संयोग निकला भी नहीं।

वहीं से यह यात्रा नीचे के कमल से ऊपर के कमल तक चली: बीज कहाँ से आए, चाँद, सूरज और आग के अक्षर कहाँ लिखे हैं, मंत्र के अक्षर शरीर में किस राह चलते हैं, ॐ कहाँ ठहरता है, भूतशुद्धि में बीज क्या करते हैं, और बोली कहाँ रुक जाती है। हर पड़ाव पर पहले बात, फिर सबूत। जहाँ हाथ ख़ाली लौटे, वहाँ भी यही लिखा है।

इस किताब की हर ईंट पुरानी है। पूर्णानंद ने यह नक़्शा लिखा, कालीचरण ने उसे खोला, पाणिनि ने अक्षरों का स्वभाव समझाया, अभिनवगुप्त ने उन्हें तत्वों से जोड़ा, और आज के बहुत से विद्वानों ने इस राह पर काम किया। उनके नाम टिप्पणियों में हैं। मैं उनके घर में अतिथि हूँ। पर इन ईंटों से जो सेतु बना, और जो बातें सिद्ध हुईं, वे इस शोध की देन हैं।

किताब में चार छोटे निशान मिलेंगे, ताकि पाठक जान सके कि किस बात को किस तरह तौलना है:

सिद्ध
गणित से साबित। काग़ज़ और पेंसिल लेकर कोई भी दोहरा सकता है।
परखा हुआ
ग्रंथ के छपे पाठ से, किसी छपे शोध से, या शब्दकोश के असली शब्दों से मिलाया हुआ।
खुला प्रश्न
अभी उत्तर अधूरा है।
मनु विश्रांति दर्शन
जहाँ शोध की भाषा रुकती है, और साधक बोलता है।

हर अध्याय के अंत के पास एक छोटा अभ्यास भी है। अक्षर सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते। वे बोले जाते हैं, और भीतर सुने जाते हैं।

यह मनु विश्रांति दर्शन की पहली किताब है, और नक़्शा यहीं खुलता है। दूसरी किताब "अर्थबीज" इन्हीं अक्षरों से बने शब्दों और नामों को परखती है, और तीसरी "नाददूत" बोली हुई आवाज़ और मंत्र की ताक़त को तौलती है। हर किताब अपने आप में पूरी है, पर इसी क्रम में पढ़ें तो हर किताब अगली के लिए ज़मीन तैयार करती है।

समुद्र ने राम से कहा था कि तत्व अपना स्वभाव नहीं छोड़ते, पर वह सेतु को थाम लेगा। यह किताब उसी वचन से शुरू होती है।

मनु विश्रांति, देहरादून

बीजसेतु के पहले पन्ने

प्रवेश: राम और समुद्र

तीन रातें बीत चुकी थीं।

समुद्र के किनारे, कुश बिछी ज़मीन पर, राम लेटे थे। उन्होंने नियम से पूजा की थी।

सामने वह समुद्र था जिसके पार लंका थी, और लंका में सीता।

पर समुद्र चुप रहा। वह सामने नहीं आया।

तब राम का धीरज टूटा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा: यह समुद्र मेरी क्षमा को मेरी कमज़ोरी समझ रहा है। धनुष लाओ।

तीर पानी में उतरे और समुद्र उबल पड़ा। गहराई के साँप और जलचर घबरा उठे।

और तब, समुद्र के ठीक बीच से, सागर स्वयं उठा, जैसे मेरु पर्वत के पीछे से सूरज उगता है। उसने हाथ जोड़े और राम से कहा:

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च राघवः । स्वभावे सौम्य तिष्ठन्ति शाश्वतं मार्गमाश्रिताः ॥

वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड 6.15.4

"राघव! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि अपने स्वभाव में रहते हैं। ये सब एक सनातन रास्ते पर टिके हैं।"

फिर उसने अपनी बात कही: मेरा स्वभाव अथाह होना है। किसी इच्छा, लालच या डर के आगे भी मैं अपना पानी जमने नहीं दूँगा।

राम का तीर अब भी चढ़ा हुआ था। पर सागर ने तीसरी राह खोली:

एष सेतुं महोत्साहः करोतु मयि वानरः । तमहं धारयिष्यामि ...

वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड 6.15.9

"यह वानर, नल, मुझ पर सेतु बनाए। मैं उसे थाम लूँगा।"

सागर ने क्या दिया

राम की पुकार किसी तक पहुँची थी। समुद्र में कोई था जो सुन सकता था और जवाब दे सकता था। पर पानी ने अपना स्वभाव नहीं छोड़ा; उसने इतना भर माना कि एक सेतु का बोझ उठा लेगा। सुनने वाला और तत्व यहाँ दो अलग हैं, फिर भी ठीक ढंग से बाँधा जाए, तो दोनों के बीच सेतु खड़ा हो सकता है।

❀ मनु विश्रांति दर्शन

मुझे लगता है हमारे भीतर भी ऐसा ही एक समुद्र है, और ऐसा ही एक सेतु। भीतर के कमलों पर अक्षर लिखे हैं, और हर कमल के बीच एक बीज। ध्यान से पढ़ें तो बीज और पंखुड़ियाँ मिलकर एक कमल से दूसरे कमल तक पुल बाँधते दिखते हैं। यह किताब उसी पुल पर चलने की कोशिश है, और इसीलिए इसका नाम है: बीजसेतु।

आगे

उस पुल का पहला पत्थर चक्र के चित्र में ही रखा है: जो बीज जिस कमल के बीच में है, उसका अक्षर किसी और कमल की पंखुड़ी पर लिखा है।

बीजसेतु से जुड़े विषय

कुंडलिनी के वे सवाल, जिनके जवाब इस साइट पर अपने अपने पन्ने पर हैं।

बीजसेतु पर सवाल जवाब

बीजसेतु किताब किस बारे में है?

बीजसेतु कुंडलिनी के चक्रों के चित्र को पढ़ने का शोध है। उसमें छह कमलों की पचास पंखुड़ियों पर पूरी वर्णमाला लिखी है, और कमलों के बीच पाँच बीज, लं, वं, रं, यं, हं। किताब दिखाती है कि पाँचों बीज अपने कमल पर नहीं, दूसरे कमलों की पंखुड़ियों पर हैं, और फिर मंत्र के रास्ते, ॐ, भूतशुद्धि और सहस्रार तक जाती है। हर बात पर निशान है कि वह गणित से सिद्ध है, ग्रंथ से परखी हुई है, या अभी खुला प्रश्न है।

पाँच तत्वों के बीज मंत्र कौन से हैं?

पृथ्वी का बीज लं है (मूलाधार), जल का वं (स्वाधिष्ठान), अग्नि का रं (मणिपूर), वायु का यं (अनाहत) और आकाश का हं (विशुद्ध)। आज्ञा पर ॐ है। यह नक़्शा पूर्णानंद के षट्चक्रनिरूपण में है, जो सन 1577 का ग्रंथ है।

चक्रों की पंखुड़ियों पर कितने अक्षर लिखे हैं?

पचास। मूलाधार पर 4, स्वाधिष्ठान पर 6, मणिपूर पर 10, अनाहत पर 12, विशुद्ध पर 16 और आज्ञा पर 2। जोड़ पचास है, यानी संस्कृत की पूरी वर्णमाला, गले से उतरकर जड़ तक।

क्या बीजसेतु में अभ्यास भी हैं?

हाँ। हर अध्याय के अंत के पास एक छोटा, सुरक्षित अभ्यास है, क्योंकि अक्षर सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते, बोले और भीतर सुने जाते हैं। ये अभ्यास जानकारी और अपने अनुभव के लिए हैं, किसी रोग का इलाज नहीं, और गहरी साधना किसी अनुभवी गुरु की देखरेख में ही करनी चाहिए।

Beejsetu in English

Beejsetu (बीजसेतु), the first book of Manu Vishranti Darshan, in Hindi: "Kundalini, bija mantras and the truth of sound: a seeker's research". It reads the chakra picture of the Ṣaṭcakranirūpaṇa (1577): the fifty letters of the Sanskrit alphabet on the petals of six lotuses, and the five bija mantras lam, vam, ram, yam and ham, none of which is written on its own lotus. Twelve chapters, one part for each chakra from Muladhara to Sahasrara, each claim marked as proven, checked or open, and a short practice near the end of each chapter.