कुंडलिनी के सात चक्र: नाम, स्थान, बीज मंत्र और पंखुड़ियाँ
नीचे से ऊपर सात चक्र हैं: मूलाधार (रीढ़ का मूल), स्वाधिष्ठान (जननेंद्रिय की जड़), मणिपूर (नाभि), अनाहत (हृदय), विशुद्ध (कंठ), आज्ञा (भौंहों के बीच) और सहस्रार (सिर के ऊपर)। पहले पाँच के बीज मंत्र लं, वं, रं, यं और हं हैं, और आज्ञा का ॐ। नीचे के छह कमलों पर कुल पचास पंखुड़ियाँ हैं, और उन पर संस्कृत की पूरी वर्णमाला लिखी है।
सातों चक्र, एक नज़र में
मूलाधाररीढ़ का मूल
स्वाधिष्ठानजननेंद्रिय की जड़
मणिपूरनाभि
अनाहतहृदय
विशुद्धकंठ
आज्ञाभौंहों के बीच
सहस्रारसिर के ऊपर
| चक्र | कहाँ | पंखुड़ियाँ | अक्षर | तत्व और मंडल | बीज | बीज का वाहन | देवता | शक्ति |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मूलाधार | रीढ़ का मूल | 4 | व श ष स | पृथ्वी; चौकोर | लं | हाथियों का राजा | बालक ब्रह्मा | डाकिनी |
| स्वाधिष्ठान | जननेंद्रिय की जड़ | 6 | ब भ म य र ल | जल; आधा चाँद | वं | मकर | हरि (विष्णु) | राकिणी |
| मणिपूर | नाभि | 10 | ड ढ ण त थ द ध न प फ | अग्नि; त्रिकोण | रं | मेढ़ा | रुद्र | लाकिनी |
| अनाहत | हृदय | 12 | क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ | वायु; छह कोनों वाला | यं | काला हिरण | ईश | काकिनी |
| विशुद्ध | कंठ | 16 | अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः | आकाश; गोल | हं | बर्फ़ जैसा सफ़ेद हाथी | सदाशिव | शाकिनी |
| आज्ञा | भौंहों के बीच | 2 | ह क्ष | मन; त्रिकोण (योनि) | ॐ | कोई नहीं बताया गया | इतर नाम का शिव | हाकिनी |
| सहस्रार | सिर के ऊपर | 1000 | पचास अक्षर, बीस बार | कोई नहीं, सब तत्वों से परे; पूरा चाँद | कोई नहीं | कोई नहीं | परमशिव | निर्वाण शक्ति |
पंखुड़ियों का रंग वही है जो षट्चक्रनिरूपण बताता है, इंद्रधनुष वाला नहीं। किसी चक्र के नाम पर जाइए, उसका पूरा पन्ना खुलेगा।
छह चक्र, और उनके ऊपर सहस्रार
षट्चक्रनिरूपण का अर्थ ही है, छह चक्रों का वर्णन। ग्रंथ पहले रीढ़ के भीतर की नाड़ियाँ बताता है: सुषुम्ना, उसके भीतर चित्रिणी, और उसके भीतर ब्रह्मनाड़ी (श्लोक 1 से 3)। फिर एक एक करके छह कमल आते हैं, मूलाधार से आज्ञा तक (श्लोक 4 से 39), और फिर उन सबके ऊपर हज़ार पंखुड़ियों वाला सहस्रार (श्लोक 40 से 49)।
इसलिए ग्रंथ की गिनती में चक्र छह हैं, और सहस्रार उनसे ऊपर का कमल। आज की बोलचाल में सहस्रार को मिलाकर सात चक्र कहे जाते हैं। दोनों गिनतियों में कमल वही सात हैं।
पचास पंखुड़ियाँ, पूरी वर्णमाला
मूलाधार पर 4, स्वाधिष्ठान पर 6, मणिपूर पर 10, अनाहत पर 12, विशुद्ध पर 16 और आज्ञा पर 2: जोड़ पचास है। और हर पंखुड़ी पर एक अक्षर है, यानी संस्कृत की पूरी वर्णमाला, गले से उतरकर जड़ तक। सोलह स्वर गले के कमल पर हैं, और व्यंजन नीचे के कमलों पर, क से शुरू होकर हृदय से नीचे। सहस्रार की हज़ार पंखुड़ियों पर यही पचास अक्षर बीस बार दोहराए गए हैं।
हर कमल के बीच उसके तत्व का बीज है। पर बीज का अक्षर, जैसे लं का ल, किस कमल की पंखुड़ी पर लिखा है? यह सवाल मनु विश्रांति की किताब बीजसेतु का पहला अध्याय है।
चक्रों के असली रंग: इंद्रधनुष नहीं
आज के ज़्यादातर चित्रों में सात चक्र इंद्रधनुष के सात रंगों में होते हैं: लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी और बैंगनी। ये रंग पुराने ग्रंथों के नहीं। ये चार्ल्स लेडबीटर ने 1927 में जोड़े, और विकिपीडिया का चक्र वाला लेख भी यही कहता है कि ये रंग किसी पुराने भारतीय ग्रंथ में नहीं मिलते।
षट्चक्रनिरूपण के रंग अलग हैं: मूलाधार की पंखुड़ियाँ गहरी लाल और बीच का चौकोर पीला; स्वाधिष्ठान सिंदूरी, बीच में सफ़ेद आधा चाँद; मणिपूर बरसाती बादलों के रंग का, बीच में लाल त्रिकोण; अनाहत बंधूक फूल जैसा लाल, बीच में धुएँ के रंग का छह कोनों वाला मंडल; विशुद्ध धुएँ जैसा बैंगनी, बीच में पूरे चाँद जैसा सफ़ेद गोला; आज्ञा चाँद जैसी सफ़ेद; और सहस्रार पूरे चाँद से भी उजला। इस साइट पर हर चक्र का कमल इन्हीं रंगों में बना है।
जो ग्रंथ में नहीं है
कुछ बातें आज बहुत दोहराई जाती हैं, पर षट्चक्रनिरूपण में नहीं हैं। मूलाधार में गणेश का नाम इसके श्लोकों में नहीं है। आज्ञा का बीज ग्रंथ में ॐ है, क्षं नहीं। और ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि और रुद्रग्रंथि किस चक्र पर हैं, यह कोई पुराना श्लोक साफ़ नहीं बताता; इस पर कुंडलिनी जागरण वाला पन्ना देखिए।
सात चक्र, एक किताब में
