पंचांग 2027

कुंडलिनी

कुंडलिनी जागरण: ग्रंथ क्या कहते हैं, और कौन सी सावधानी ज़रूरी है

सीधा जवाब

कुंडलिनी जागरण का अर्थ है, मूलाधार में सोई शक्ति का जागना, और सुषुम्ना नाड़ी से होकर चक्रों को पार करते हुए सिर के ऊपर सहस्रार तक उठना। हठयोगप्रदीपिका (3.2) कहती है कि गुरु की कृपा से जब सोई हुई कुंडली जागती है, तब सारे कमल और गाँठें खुल जाती हैं। षट्चक्रनिरूपण बताता है कि वह ऊपर जाकर फिर उसी रास्ते मूलाधार में लौटती है।

हठयोगप्रदीपिका क्या कहती है

सशैलवनधात्रीणां यथाधारोऽहिनायकः। सर्वेषां योगतन्त्राणां तथाधारो हि कुण्डली॥

हठयोगप्रदीपिका 3.1

जैसे पहाड़ों और जंगलों समेत धरती का आधार नागों का राजा है, वैसे ही सारे योग का आधार कुंडली है।

सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कुण्डली। तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रन्थयोऽपि च॥

हठयोगप्रदीपिका 3.2

गुरु की कृपा से जब सोई हुई कुंडली जागती है, तब सारे कमल और गाँठें भी खुल जाती हैं।

हठयोगप्रदीपिका का तीसरा उपदेश, जो इन्हीं दो श्लोकों से शुरू होता है, मुद्राओं और बंधों का है। यानी ग्रंथ जागरण को अभ्यास से जोड़ता है, और साथ में गुरु की कृपा को उसकी शर्त बताता है।

षट्चक्रनिरूपण में कुंडलिनी की यात्रा

षट्चक्रनिरूपण के आख़िरी श्लोक (50 से 53) पूरी यात्रा बताते हैं। यम और नियम से शुद्ध हुआ योगी हूं की ध्वनि से देवी को जगाता है, और उसे ब्रह्मद्वार में ले जाता है (श्लोक 50)। वह तीन लिंगों को भेदती हुई ऊपर जाती है (श्लोक 51)। ये तीन लिंग ग्रंथ में पहले आ चुके हैं: मूलाधार का स्वयंभू, अनाहत का बाण, और आज्ञा का इतर।

योगी उसे जीव के साथ परशिव तक ले जाता है (श्लोक 52)। वहाँ अमृत पीकर वह उसी रास्ते लौटती है, और फिर मूलाधार में आ जाती है (श्लोक 53)। यानी ग्रंथ में जागरण एक बार ऊपर जाकर रुक जाना नहीं, आना और लौटना है।

तीन ग्रंथियाँ: ब्रह्म, विष्णु और रुद्र

हठयोगप्रदीपिका का चौथा उपदेश (श्लोक 69 से 76) अभ्यास की चार अवस्थाएँ बताता है: आरंभ, घट, परिचय और निष्पत्ति। आरंभ में ब्रह्मग्रंथि खुलती है, और देह में अनाहत ध्वनि सुनाई देती है (4.70)। घट में विष्णुग्रंथि खुलती है, और भेरी जैसी ध्वनि आती है (4.73)। निष्पत्ति में रुद्रग्रंथि खुलती है, और बाँसुरी और वीणा जैसी ध्वनि (4.76)।

कौन सी ग्रंथि किस चक्र पर है, यह ये श्लोक नहीं बताते, और षट्चक्रनिरूपण भी इन तीन ग्रंथियों के नाम नहीं लेता। आज की आम सूची, ब्रह्मग्रंथि मूलाधार पर, विष्णुग्रंथि अनाहत पर और रुद्रग्रंथि आज्ञा पर, षट्चक्रनिरूपण के तीन लिंगों की जगहों से मेल खाती है, पर किसी पुराने श्लोक में ऐसे लिखी नहीं मिलती।

सावधानी

ग्रंथ जागरण को गुरु की कृपा और देखरेख से जोड़ते हैं, अकेले किताब से नहीं। आज जागरण के जो लक्षण बताए जाते हैं, जैसे रीढ़ में गर्मी, कंपन, रोशनी दिखना या नींद न आना, वे लोगों के अपने अनुभव हैं, पुराने ग्रंथों की सूची नहीं। यही लक्षण कई रोगों में भी होते हैं। ध्यान या साँस के किसी अभ्यास के बाद ऐसा कुछ हो, तो अभ्यास रोकिए और डॉक्टर से मिलिए।

जागरण की राह पर एक किताब

बीजसेतु का कवर: गहरे नीले पर पाँच घेरे, नीचे से ऊपर के पाँच कमल, उन पर पंखुड़ियों के अक्षर, और सुनहरे अक्षरों में पाँच बीज

बीजसेतु: कुंडलिनी, बीज मंत्र और आवाज़ का सच: एक साधक का शोध

मनु विश्रांति की पहली किताब, मूलाधार से सहस्रार तक। इसके आख़िरी हिस्से भूतशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार पर हैं: बीज वहाँ क्या करते हैं, और बोली कहाँ रुक जाती है।

सवाल जवाब

कुंडलिनी जागरण पर सवाल

कुंडलिनी जागरण क्या है?

मूलाधार में सोई कुंडलिनी शक्ति का जागना, और सुषुम्ना नाड़ी से चक्रों को पार करते हुए सिर के ऊपर सहस्रार तक उठना। हठयोगप्रदीपिका (3.2) कहती है कि गुरु की कृपा से जब सोई कुंडली जागती है, तब सारे कमल और गाँठें खुल जाती हैं।

ग्रंथों के अनुसार कुंडलिनी जागरण कैसे होता है?

हठयोगप्रदीपिका जागरण को गुरु की कृपा और मुद्रा और बंध के अभ्यास से जोड़ती है; उसका तीसरा उपदेश इन्हीं का है। षट्चक्रनिरूपण (श्लोक 50) बताता है कि यम और नियम से शुद्ध योगी हूं की ध्वनि से देवी को जगाता है।

कुंडलिनी जागरण के लक्षण क्या हैं?

आज बताए जाने वाले लक्षण, जैसे रीढ़ में गर्मी, कंपन या रोशनी दिखना, लोगों के अपने अनुभव हैं, पुराने ग्रंथों की सूची नहीं। यही लक्षण कई रोगों में भी होते हैं, इसलिए ऐसा कुछ हो तो अभ्यास रोकिए और डॉक्टर से मिलिए।

कुंडलिनी की तीन ग्रंथियाँ कौन सी हैं?

ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि और रुद्रग्रंथि। हठयोगप्रदीपिका (4.70, 4.73, 4.76) के अनुसार ये क्रम से आरंभ, घट और निष्पत्ति अवस्था में खुलती हैं। ये किस चक्र पर हैं, यह कोई पुराना श्लोक साफ़ नहीं बताता।

क्या कुंडलिनी जागरण के बाद वह ऊपर ही रहती है?

षट्चक्रनिरूपण (श्लोक 53) के अनुसार नहीं। परशिव तक पहुँचकर और अमृत पीकर वह उसी रास्ते लौटती है, और फिर मूलाधार में आ जाती है।

Kundalini awakening, in English

Kundalini awakening (jāgaraṇa) is the waking of the power asleep in Muladhara and its rise through the Sushumna channel to Sahasrara. The Haṭhayogapradīpikā (3.2) says that when the sleeping Kuṇḍalī wakes by the guru's grace, all the lotuses and knots are pierced; its third chapter, on mudras and bandhas, begins with this. The Ṣaṭcakranirūpaṇa (vv. 50-53) has the yogi wake her with the sound hūṃ, lead her through the three lingas to Paraśiva, and return her the same way to Muladhara. HYP 4.70-4.76 gives the order of the three knots (Brahma, Vishnu, Rudra granthi) but names no chakra for them. Lists of "symptoms" are modern accounts, not classical; anyone unwell after practice should stop and see a doctor.

कुंडलिनी जागरण के स्रोत

  1. हठयोगप्रदीपिका, तीसरा उपदेश: मुद्रा और बंध, श्लोक 1 और 2
  2. हठयोगप्रदीपिका 4.65 से 4.77: चार अवस्थाएँ और तीन ग्रंथियाँ
  3. षट्चक्रनिरूपण, श्लोक 50 (आर्थर एवलॉन का अनुवाद, wisdomlib)
  4. षट्चक्रनिरूपण, श्लोक 51 (आर्थर एवलॉन का अनुवाद, wisdomlib)
  5. षट्चक्रनिरूपण, श्लोक 52 (आर्थर एवलॉन का अनुवाद, wisdomlib)
  6. षट्चक्रनिरूपण, श्लोक 53 (आर्थर एवलॉन का अनुवाद, wisdomlib)
  7. Kundalini (Wikipedia)

षट्चक्रनिरूपण के श्लोकों की संख्या आर्थर एवलॉन (जॉन वुडरॉफ़) के अनुवाद द सर्पेंट पावर (1919) के अनुसार है, जैसा wisdomlib छापता है। हठयोगप्रदीपिका की संख्या उसके आम छपे पाठ के अनुसार है; कुछ संस्करणों में एक दो श्लोक आगे पीछे हो सकते हैं।