कुंडलिनी जागरण: ग्रंथ क्या कहते हैं, और कौन सी सावधानी ज़रूरी है
कुंडलिनी जागरण का अर्थ है, मूलाधार में सोई शक्ति का जागना, और सुषुम्ना नाड़ी से होकर चक्रों को पार करते हुए सिर के ऊपर सहस्रार तक उठना। हठयोगप्रदीपिका (3.2) कहती है कि गुरु की कृपा से जब सोई हुई कुंडली जागती है, तब सारे कमल और गाँठें खुल जाती हैं। षट्चक्रनिरूपण बताता है कि वह ऊपर जाकर फिर उसी रास्ते मूलाधार में लौटती है।
हठयोगप्रदीपिका क्या कहती है
सशैलवनधात्रीणां यथाधारोऽहिनायकः। सर्वेषां योगतन्त्राणां तथाधारो हि कुण्डली॥
हठयोगप्रदीपिका 3.1
जैसे पहाड़ों और जंगलों समेत धरती का आधार नागों का राजा है, वैसे ही सारे योग का आधार कुंडली है।
सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कुण्डली। तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रन्थयोऽपि च॥
हठयोगप्रदीपिका 3.2
गुरु की कृपा से जब सोई हुई कुंडली जागती है, तब सारे कमल और गाँठें भी खुल जाती हैं।
हठयोगप्रदीपिका का तीसरा उपदेश, जो इन्हीं दो श्लोकों से शुरू होता है, मुद्राओं और बंधों का है। यानी ग्रंथ जागरण को अभ्यास से जोड़ता है, और साथ में गुरु की कृपा को उसकी शर्त बताता है।
षट्चक्रनिरूपण में कुंडलिनी की यात्रा
षट्चक्रनिरूपण के आख़िरी श्लोक (50 से 53) पूरी यात्रा बताते हैं। यम और नियम से शुद्ध हुआ योगी हूं की ध्वनि से देवी को जगाता है, और उसे ब्रह्मद्वार में ले जाता है (श्लोक 50)। वह तीन लिंगों को भेदती हुई ऊपर जाती है (श्लोक 51)। ये तीन लिंग ग्रंथ में पहले आ चुके हैं: मूलाधार का स्वयंभू, अनाहत का बाण, और आज्ञा का इतर।
योगी उसे जीव के साथ परशिव तक ले जाता है (श्लोक 52)। वहाँ अमृत पीकर वह उसी रास्ते लौटती है, और फिर मूलाधार में आ जाती है (श्लोक 53)। यानी ग्रंथ में जागरण एक बार ऊपर जाकर रुक जाना नहीं, आना और लौटना है।
तीन ग्रंथियाँ: ब्रह्म, विष्णु और रुद्र
हठयोगप्रदीपिका का चौथा उपदेश (श्लोक 69 से 76) अभ्यास की चार अवस्थाएँ बताता है: आरंभ, घट, परिचय और निष्पत्ति। आरंभ में ब्रह्मग्रंथि खुलती है, और देह में अनाहत ध्वनि सुनाई देती है (4.70)। घट में विष्णुग्रंथि खुलती है, और भेरी जैसी ध्वनि आती है (4.73)। निष्पत्ति में रुद्रग्रंथि खुलती है, और बाँसुरी और वीणा जैसी ध्वनि (4.76)।
कौन सी ग्रंथि किस चक्र पर है, यह ये श्लोक नहीं बताते, और षट्चक्रनिरूपण भी इन तीन ग्रंथियों के नाम नहीं लेता। आज की आम सूची, ब्रह्मग्रंथि मूलाधार पर, विष्णुग्रंथि अनाहत पर और रुद्रग्रंथि आज्ञा पर, षट्चक्रनिरूपण के तीन लिंगों की जगहों से मेल खाती है, पर किसी पुराने श्लोक में ऐसे लिखी नहीं मिलती।
सावधानी
ग्रंथ जागरण को गुरु की कृपा और देखरेख से जोड़ते हैं, अकेले किताब से नहीं। आज जागरण के जो लक्षण बताए जाते हैं, जैसे रीढ़ में गर्मी, कंपन, रोशनी दिखना या नींद न आना, वे लोगों के अपने अनुभव हैं, पुराने ग्रंथों की सूची नहीं। यही लक्षण कई रोगों में भी होते हैं। ध्यान या साँस के किसी अभ्यास के बाद ऐसा कुछ हो, तो अभ्यास रोकिए और डॉक्टर से मिलिए।
जागरण की राह पर एक किताब
