षट्चक्रनिरूपण: पूर्णानंद का ग्रंथ, जिससे चक्रों का चित्र बना
षट्चक्रनिरूपण का अर्थ है, छह चक्रों का वर्णन। इसे बंगाल के तांत्रिक साधक पूर्णानंद ने लिखा, अपने ग्रंथ श्रीतत्त्वचिंतामणि के छठे अध्याय के रूप में, जो सन 1577 में पूरा हुआ। इसके पचपन श्लोकों में हर चक्र की पंखुड़ियाँ, उन पर लिखे अक्षर, तत्व, बीज, देवता और शक्ति बताई गई है। 1919 में आर्थर एवलॉन (जॉन वुडरॉफ़) ने इसे अंग्रेज़ी में द सर्पेंट पावर नाम से छापा, और वहीं से यह चित्र दुनिया भर में फैला।
षट्चक्रनिरूपण, एक नज़र में
| नाम का अर्थ | षट् यानी छह, और निरूपण यानी वर्णन: छह चक्रों का वर्णन |
|---|---|
| लेखक | पूर्णानंद, बंगाल के तांत्रिक साधक; गुरु ब्रह्मानंद परमहंस |
| कब | सन 1577, श्रीतत्त्वचिंतामणि के छठे अध्याय के रूप में |
| भाषा | संस्कृत |
| श्लोक | पचपन |
| टीका | कालीचरण |
| अंग्रेज़ी अनुवाद | आर्थर एवलॉन (जॉन वुडरॉफ़), द सर्पेंट पावर, लंदन, 1919 |
| किस श्लोक में क्या | नाड़ियाँ 1 से 3 · छह चक्र 4 से 39 · सहस्रार 40 से 49 · कुंडलिनी की यात्रा 50 से 53 · फल 54 और 55 |
ग्रंथ में क्या है
पहले तीन श्लोक रीढ़ के भीतर की नाड़ियाँ बताते हैं: सुषुम्ना, चित्रिणी और ब्रह्मनाड़ी। श्लोक 4 से 39 छह कमल, एक एक करके, नीचे से ऊपर: मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। श्लोक 40 से 49 हज़ार पंखुड़ियों वाला सहस्रार। श्लोक 50 से 53 कुंडलिनी की यात्रा, ऊपर और फिर नीचे। और आख़िरी दो श्लोक इसके फल।
हर कमल के लिए ग्रंथ लगभग एक ही क्रम रखता है: वह कहाँ है, कितनी पंखुड़ियाँ और किस रंग की, उन पर कौन से अक्षर, बीच में किस तत्व का मंडल, उसका बीज और उसका वाहन, बीज की गोद में देवता, कमल की शक्ति, और उसके ध्यान का फल।
आज का चक्र चित्र यहीं से
आज जो चक्र चित्र घर घर में है, उसकी जड़ यही ग्रंथ है, एवलॉन के अनुवाद के रास्ते। पर रास्ते में उसमें कुछ जुड़ भी गया। 1927 में चार्ल्स लेडबीटर ने चक्रों को इंद्रधनुष के सात रंग दिए, जो इस ग्रंथ में नहीं। कई चित्रों में मूलाधार पर गणेश और आज्ञा पर बीज क्षं आ गए, ये भी इस ग्रंथ में नहीं। इस साइट के चक्र पन्ने ग्रंथ के अपने रंग और अपनी बातें रखते हैं, श्लोक की संख्या के साथ।
इसे कहाँ पढ़ें
एवलॉन का अनुवाद, कालीचरण की टीका के साथ, श्लोक दर श्लोक wisdomlib पर पढ़ा जा सकता है। उसका पता नीचे स्रोतों में है। हर श्लोक के साथ संस्कृत, उसका शब्दार्थ और टीका भी है।
इसी ग्रंथ के चित्र को पढ़ने वाली किताब
