पंचांग 2027

मनु प्रयोगशाला

ग्रंथ जो कहते हैं, उसे चलाकर देखिए

कुंडलिनी की किताबें बहुत कुछ ऐसा कहती हैं जो पढ़ने में सुंदर है, पर आँख से दिखता नहीं: अक्षर कमलों पर, जगत शरीर में, शब्द धातु से, साँस में मंत्र। यहाँ हर ऐसी बात एक प्रयोग बनकर सामने है, जिसे आप चलाकर देख सकते हैं, और हर अंक के साथ लिखा है कि वह कितना पक्का है। मक़सद चमत्कार दिखाना नहीं, देखने की आदत बनाना है: ध्यान से, बिना जल्दबाज़ी के, और ईमानदारी से।

किसी एक सवाल से शुरू कीजिए

पाँच प्रयोग

हर प्रयोग एक ही गहरे आकाश में खुलता है, जहाँ आकाशगंगाओं से उतरकर रोशनी की एक आकृति और उसकी रीढ़ के छह कमलों तक पहुँचा जा सकता है। हर एक किसी ग्रंथ या किताब की एक बात को देखने लायक़ बनाता है।

  1. मंत्र का नक़्शा

    कोई भी मंत्र, श्लोक या अपना नाम लिखिए; हर अक्षर अपने कमल तक जाता है।

    क्यों बना
    षट्चक्रनिरूपण के चित्र में वर्णमाला के पचास अक्षर शरीर के छह कमलों की पंखुड़ियों पर लिखे हैं।
    क्या देखिए
    रास्ता किन कमलों तक पहुँचता है, और कौन से कमल अछूते रह जाते हैं।
    ध्यान में
    जप में मन अक्सर भटकता है।

    प्रयोग खोलिएबीजसेतु और अर्थबीज से, लगभग 5 मिनट

  2. शरीर में ब्रह्मांड

    वेद, उपनिषद और पुराणों के श्लोक, एक एक दृश्य बनकर: अंगों से सूरज और चाँद, चौदह लोक, हृदय का आकाश।

    क्यों बना
    पुरुष सूक्त से शिव संहिता तक ग्रंथ बार बार कहते हैं कि जो बाहर है, वह भीतर भी है: आँख में सूरज, मन में चाँद, हृदय में आकाश।
    क्या देखिए
    पुरुष सूक्त में जगत शरीर से बनता है; ऐतरेय उपनिषद में वही देवता लौटकर अंगों में समाते हैं। एक ही बात, दो दिशाएँ।
    ध्यान में
    ध्यान की कई पुरानी विधियाँ एक दृश्य पर मन टिकाने से शुरू होती हैं।

    प्रयोग खोलिएवेद, उपनिषद, पुराण और योग के ग्रंथों से, लगभग 8 मिनट

  3. शब्द की बनावट

    धातु से नया संस्कृत नाम, स्टेशन दर स्टेशन: सोलर पैनल से रोबोट तक, और आपका अपना शब्द।

    क्यों बना
    संस्कृत के शब्द मनमाने नहीं, बनाए जाते हैं: एक धातु (काम), एक जोड़ (प्रत्यय) और संधि।
    क्या देखिए
    एक ही धातु से कितने शब्द निकलते हैं: पठ् से पाठक, पाठ, पठन।
    ध्यान में
    योगसूत्र (1.28) जप के साथ अर्थ की भावना की बात करता है: “तज्जपस्तदर्थभावनम्”।

    प्रयोग खोलिएअर्थबीज से, लगभग 6 मिनट

  4. आवाज़ की परख

    साँस का हंस और 21,600 की गिनती, आवाज़ की ताक़त का तराज़ू, और रेत की प्लेट जो छूने पर ही चित्र बनाती है।

    क्यों बना
    आवाज़ और मंत्र पर बहुत बड़े दावे सुनने को मिलते हैं: आवाज़ से रोग जाएँ, पत्थर हिलें, ॐ से श्रीयंत्र बने।
    क्या देखिए
    आवाज़ काम नहीं करती, छेड़ती है: असर वहीं होता है जहाँ कोई चीज़ पहले से किनारे पर हो, या कोई सुनने वाला हो।
    ध्यान में
    मंत्र का असर ढूँढ़ना हो, तो उसे सुनने वाले के ध्यान में ढूँढ़िए, हवा में नहीं।

    प्रयोग खोलिएनाददूत से, लगभग 10 मिनट

  5. बीजों का घर

    वर्णमाला गले से जड़ तक उतरती है, पाँच बीज अपने घर से बाहर, और 4,495 बँटवारे बताते हैं कि मूलाधार की चार ही पंखुड़ियाँ क्यों।

    क्यों बना
    पाँच तत्वों के बीज लं वं रं यं हं अपने कमल के बीच में लिखे जाते हैं, पर उनके अक्षर किसी दूसरे कमल की पंखुड़ियों पर हैं।
    क्या देखिए
    एक भी बीज अपने ही कमल पर नहीं रुकता; हर धागा किसी और कमल तक जाता है।
    ध्यान में
    बीज मंत्रों को उनके तत्व और कमल के साथ जानना जप को अंधा नहीं रहने देता: लं धरती का बीज है, मूलाधार के बीच लिखा जाता है।

    प्रयोग खोलिएबीजसेतु से, लगभग 8 मिनट

ये यंत्र नहीं, तंत्र नहीं, प्रयोग हैं

क्योंकि यही ये हैं: हर एक में आप किसी ग्रंथ या किताब की एक बात को चलाकर देखते हैं, गिनते हैं और परखते हैं। ये पूजा के यंत्र नहीं, कोई तंत्र साधना नहीं, और यहाँ किसी मंत्र के साथ कुछ किया नहीं जाता: मंत्र बस अक्षरों की तरह पढ़ा, कमलों पर रखा और गिना जाता है। इनसे कोई सिद्धि नहीं मिलती; मिलती है ध्यान से देखने और ईमानदारी से परखने की आदत।

यहाँ जो दिखता है, वह नक़्शा और हिसाब है, किसी मंत्र का असर नहीं। अनुभव हर व्यक्ति का अपना होता है; कोई प्रयोग उसका वादा नहीं करता।

कैसे चलाएँ

  • शांत, सरल, पूराकितना जानना है: शांत में सिर्फ़ दृश्य, सरल में छोटी कहानी, पूरा में हर नाप, हवाला और ग्रंथ।
  • खींचिए, पास जाइएउँगली या माउस से खींचकर घुमाइए। दो उँगलियों से, या Ctrl के साथ स्क्रॉल करके, पास और दूर।
  • दूरी की सीढ़ीकमल, शरीर, विराट, तारे, आकाशगंगाएँ: एक छुअन में एक पंखुड़ी से पूरे आकाश तक। “शरीर” हमेशा आपको आकृति के सामने लौटा देता है।
  • छूकर समझिएबिंदीदार रेखा वाला हर शब्द और ⓘ वाला हर बटन छूने पर बताता है कि वह क्या है, क्यों है, और कैसे काम आता है।
  • परतें और पूरी स्क्रीनजो ध्यान भटकाए, उसे “परतें” से बंद कीजिए। पूरी स्क्रीन में दृश्य सबसे साफ़ और सबसे बड़ा दिखता है।

हर अंक पर एक निशान

हर गिनती और हर बात के साथ लिखा है कि वह कितनी पक्की है, ताकि आप जानें कि किस पर कितना भरोसा करें।

  • सिद्धगणित से साबित। कोई भी गिनकर वही पाएगा।
  • परखा हुआकिसी ग्रंथ के पाठ से, या छपे हुए प्रयोग से मिलाया हुआ।
  • खुला प्रश्नअभी तय नहीं। जहाँ पता नहीं, वहाँ यही लिखा है।
  • मनु विश्रांति दर्शनलेखक का अपना दृष्टिकोण, प्रमाण नहीं।
  • किताबों से आगेजो गिनती तीनों किताबों में नहीं, इस प्रयोगशाला ने जोड़ी है।

मनु प्रयोगशाला पर सवाल जवाब

मनु प्रयोगशाला क्या है?

मनु विश्रांति की कुंडलिनी पर तीन किताबों (बीजसेतु, अर्थबीज और नाददूत) और वेद, उपनिषद और पुराणों के वर्णनों से बने पाँच प्रयोग, जो ब्राउज़र में 3D में चलते हैं: मंत्र का नक़्शा, शरीर में ब्रह्मांड, शब्द की बनावट, आवाज़ की परख और बीजों का घर। ये मुफ़्त हैं और फ़ोन पर भी चलते हैं।

इन्हें प्रयोग क्यों कहा गया है? क्या ये प्रयोग या तंत्र हैं?

क्योंकि यही ये हैं: हर एक में आप किसी ग्रंथ या किताब की एक बात को चलाकर देखते हैं, गिनते हैं और परखते हैं। ये पूजा के यंत्र नहीं, कोई तंत्र साधना नहीं, और यहाँ किसी मंत्र के साथ कुछ किया नहीं जाता: मंत्र बस अक्षरों की तरह पढ़ा, कमलों पर रखा और गिना जाता है। इनसे कोई सिद्धि नहीं मिलती; मिलती है ध्यान से देखने और ईमानदारी से परखने की आदत।

क्या यह प्रयोगशाला जप या कुंडलिनी जागरण सिखाती है?

नहीं। यह प्रयोगशाला किसी को जप के लिए मंत्र नहीं देती और कोई अभ्यास नहीं सिखाती। यह दिखाती है कि ग्रंथ अक्षर, शरीर और आवाज़ के बारे में क्या कहते हैं, और उन बातों की गिनती क्या कहती है। गहरी साधना किसी अनुभवी गुरु की देखरेख में ही करें।

क्या ये विज्ञान के दावे हैं?

नहीं। हर अंक के साथ उसका निशान है: ✦ सिद्ध (गणित से साबित), ◆ परखा हुआ (ग्रंथ या छपे प्रयोग से मिलाया), ○ खुला प्रश्न, ❀ मनु विश्रांति दर्शन, और जो किताबों में नहीं, उस पर “किताबों से आगे”। ग्रंथों के वर्णन ग्रंथों के वर्णन की तरह ही दिखाए गए हैं।

इसे चलाकर किसी को क्या मिलेगा?

देखने की एक नई नज़र: मंत्र को एक बनावट की तरह, शब्द को धातु से, साँस को बिना बदले, और बड़े दावों को तौलकर। बहुत से लोगों को इससे जप और ध्यान के लिए एक ठोस सहारा मिलता है, पर कोई प्रयोग किसी अनुभव का वादा नहीं करता।

क्या बच्चे इसे चला सकते हैं?

हाँ। हर प्रयोग में “सरल” स्तर पर एक छोटी कहानी है, हर कठिन शब्द पर छूकर उसका अर्थ मिलता है, और पहली बार आने पर एक छोटा सा दौरा भी, अगर आप चाहें। “पूरा” स्तर बड़ों और खोजियों के लिए है।

किस फ़ोन या कंप्यूटर पर चलेगा?

किसी भी नए ब्राउज़र में, फ़ोन, टैबलेट या कंप्यूटर पर। धीमे फ़ोन पर दृश्य अपने आप हल्का हो जाता है। पूरी स्क्रीन का बटन सबसे अच्छा अनुभव देता है।

रास्ता नक़्शा है, मंत्र का असर नहीं। ये प्रयोग अक्षरों और आवाज़ का हिसाब दिखाते हैं; किसी मंत्र या सुर से इलाज, शक्ति या जागरण का दावा यहाँ नहीं है।

यह प्रयोगशाला किसी को जप के लिए मंत्र नहीं देती, और कोई अभ्यास नहीं सिखाती। साँस रोकने वाला कोई अभ्यास यहाँ नहीं है। गहरी साधना किसी अनुभवी गुरु की देखरेख में ही करें।

Manu Prayogshala, in English

Manu Prayogshala (मनु प्रयोगशाला, "Manu's laboratory") is a free set of five interactive 3D experiments in Hindi, built from Manu Vishranti's three books on Kundalini (Beejsetu, Arthbeej and Naaddoot) and from the Vedas, Upanishads and Puranas. It runs in any web browser, on phones too.

  • Mantra map: type any mantra or your own name; each letter travels to its petal on the six lotuses of the Ṣaṭcakranirūpaṇa, with every measure explained.
  • The universe in the body: verses from the Purusha Sukta, Aitareya and Chandogya Upanishads, the Bhagavata Purana and the Shiva Samhita, each turned into a scene.
  • How a word is built: new Sanskrit names made from Panini's roots and suffixes, station by station, from the solar panel to the robot.
  • Testing sound: the breath's ajapa count of 21,600, how much power a voice really has, and a sand plate that draws only when it is touched.
  • The home of the seeds: why the five element seeds sit away from their own lotus, counted over 4,495 splits and two hundred thousand shuffles.

They are experiments, not yantras for worship and not tantra: a mantra is only read as letters, placed and counted. Every number carries a mark of how certain it is, and nothing here is offered as a mantra for japa or as a practice.