सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में · भारत के बाहर
यम ज़ातदो
Yama Zatdaw
- भाषा बर्मी
- किसकी बर्मी परंपरा, कई हाथ
- कब परंपरा ग्यारहवीं सदी तक जाती है; पहला लिखा ज़िक्र 1527, मुख्य रचनाएँ 1775 से
- कहाँ आवा और मंडले, म्यांमार
यह कथा
बर्मा की रामकथा, जिसका नाम यम ज़ातदो है, यानी राम की जातक कथा। बर्मा में यह कथा मंच की कथा है, और वहाँ के लोग इसे अपनी जातक कथाओं में गिनते हैं। लिखे हुए पाठ से ज़्यादा यह खेली जाने वाली कथा है।
एक नज़र में
यम ज़ातदो, अपनी लिपि में
ရာမဇာတ်တော်
- लिपि
- बर्मी लिपि
- रूप
- मुखौटा नृत्य नाटक, कठपुतली, गीत और गद्य कथाएँ
- समय
- परंपरा ग्यारहवीं सदी के राजा अनिरुद्ध तक जाती है; पहला लिखा ज़िक्र 1527; मुख्य रचनाएँ 1775 से
इस कथा की लंका
- एक शाप से हनुमान जी की आधी शक्ति चली गई है, और जाम्बवान उन्हें भेजने को कहते हैं।
- लंका में वे अशोक के पेड़ में छिपकर सीता को धीरे से राम की कथा सुनाते हैं, और अँगूठी से पहचान होती है।
- सबूत के लिए सीता के सात बाल लाते हैं; और पुल पर एक विशाल केकड़े के डंक उखाड़ते हैं।
आज: बर्मा के शास्त्रीय नृत्य नाटक और कठपुतली में आज भी, जहाँ राम बोधिसत्व की तरह खेले जाते हैं।
सुंदरकांड के पल, इस कथा में
खेल में लंका की किसी जगह पर पहुँचकर वही पल दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है। यह कथा उन पलों को ऐसे कहती है।
वाटिका का कोना
दूसरा दिन: आग
बर्मी मंच पर यह कोना बहुत साफ़ दिखाया जाता है।
पुतलियों के चेहरे नहीं बदलते, इसलिए सब कुछ हरकत और ढोल की ताल से कहा जाता है।
पुतली का सिर धीरे से एक ओर झुकता है, और दर्शक समझ जाते हैं कि वह रो रही है।
ढोल की ताल धीमी होती जाती है, और मंच पर रोशनी कम कर दी जाती है।
डर और राहत, दोनों वहाँ शरीर की चाल से पहुँचते हैं।
यम ज़ातदो; यम ज़ात प्वे · त्रिजटाइस कथा के 1 और पल खेल के भीतर पढ़े जा सकते हैं: नगर का चौक।
इस कथा से खेल के पत्ते
खेल में ये पत्ते इसी कथा से खुलते हैं। हर पत्ते में एक ऐसी बात है जो बहुत कम लोगों ने सुनी है।
उपन्यास
इस कथा की लंका, उपन्यास में
मनु विश्रांति की उपन्यास गाथा उनतालीस लंकाएँ इस कथा की लंका में उतरती है। तीनों खंड लिखे जा चुके हैं, और प्रकाशन की तैयारी में हैं।
खंड 2, पानी पर आग: इस बार पूरी तैयारी है।- सदियों का एक मेहमान: ऊ तुन, अमरपुर, 1792। खंड 2, पानी पर आग