आकाश खुल रहा है…
आवाज़ की परख
क्या दिखे, क्या नहीं
यह प्रयोग क्यों
आवाज़ और मंत्र पर बहुत बड़े दावे सुनने को मिलते हैं: आवाज़ से रोग जाएँ, पत्थर हिलें, ॐ से श्रीयंत्र बने। नाददूत पूछती है: आवाज़ सच में क्या कर सकती है, और क्या नहीं? यह प्रयोग तीन हिस्सों में उसी सवाल को आपके हाथ में देता है।
क्या करें
- ऊपर तीन हिस्से हैं; एक चुनिए। हर हिस्से की शुरुआत में लिखा है कि वहाँ क्या करना है।
- अजपा की घड़ी से शुरू कीजिए: बस अपनी साँस पर दो बटन दबाने हैं।
क्या देखिए
- आवाज़ काम नहीं करती, छेड़ती है: असर वहीं होता है जहाँ कोई चीज़ पहले से किनारे पर हो, या कोई सुनने वाला हो।
- ग्रंथ की गिनती और नापी हुई गिनती में फ़र्क़: हर अंक पर लिखा है कि वह कहाँ से है।
इसके हिस्से
अजपा की घड़ी
घेरंड संहिता कहती है कि साँस अपने आप “हंस” जपती है: बाहर जाते “ह”, भीतर आते “स”, दिन में 21,600 बार। यह हिस्सा दिखाता है कि यह संख्या कहाँ से आती है, और आपकी अपनी साँस कितनी है।
- साँस को जैसे चल रही है, वैसे चलने दीजिए। उसे बदलना नहीं है, रोकना तो बिल्कुल नहीं।
- साँस बाहर जाए तो “ह” दबाइए, भीतर आए तो “स”। आकृति के ऊपर का घेरा आपकी साँस के साथ चलेगा।
- एक मिनट गिनिए और अपनी गिनती को ग्रंथ की 15 से मिलाइए।
देखिए: ज़्यादातर लोग पाते हैं कि गिनना शुरू करते ही साँस अपने आप धीमी या भारी होने लगती है। साँस को बिना छुए देखना जितना आसान लगता है, उतना है नहीं।
आवाज़ का तराज़ू
आवाज़ में ताक़त कितनी होती है? यह हिस्सा आवाज़ को वाट में तौलता है और उसके बगल में फावड़े वाला आदमी रखता है, ताकि बड़े दावों को एक पैमाने पर रखा जा सके।
- डंडों में से कोई आवाज़ चुनिए, फुसफुसाहट से ओपेरा तक, और देखिए उससे मिट्टी उठाने में कितने बरस लगेंगे।
- दूरी बदलिए: दूरी दोगुनी, आवाज़ 6 डेसिबल धीमी।
- आख़िर में दावों पर अपना निशान लगाइए, फिर किताब का निशान खोलिए।
देखिए: आवाज़ का सबसे ऊँचा डंडा भी फावड़े तक नहीं पहुँचता। फिर भी हिलती हुई आग 90 डेसिबल पर बुझ गई: आवाज़ उसे छेड़ती है जो पहले से किनारे पर हो।
आवाज़ के चित्र
रेत पर बने सुंदर चित्रों के वीडियो देखकर बहुत लोग मानते हैं कि ॐ गाने से यंत्र बनता है। यह हिस्सा दिखाता है कि चित्र प्लेट के अपने आकार से बनते हैं, और तभी बनते हैं जब प्लेट को सीधे हिलाया जाए।
- कोई वरदान, शाप या उपचार के दावे वाला मंत्र चुनकर ऊपर के प्लेयर में “चलाइए” दबाइए: हर शब्दांश अपनी मात्रा जितना चलेगा, और रेत नया चित्र बनाएगी।
- प्लेयर में गति, जप का ढंग (बोलकर, होंठों में, मन में) और सुर बदलकर देखिए; हर बदलाव के साथ नीचे लिखा आता है कि कौन ऐसा करता है और क्यों।
- “किसी दूसरे से मिलाइए” में दूसरा मंत्र चुनिए, फिर आवाज़ को पुरुष से बच्चे पर बदलिए, और दोनों का फ़र्क़ देखिए।
- “प्लेट को छुआ हुआ” बंद कीजिए: अब सुर हवा में है, और रेत हिलती नहीं।
- “ॐ के 136.1 हर्ट्ज़ का हिसाब” खोलकर दोगुना करते जाइए।
देखिए: चित्र स्वर और आवाज़ के सुर से बदलता है, अर्थ से नहीं: वरदान और शाप में एक जैसे स्वर हों, तो रेत पर वे एक जैसे दिखते हैं। सुंदर चीज़ और सच्ची चीज़ में फ़र्क़ करना यहीं से शुरू होता है।
इससे क्या मिलता है
बड़े दावों के सामने एक सीधा सवाल पूछने की आदत: कितना, कैसे नापा, किसने परखा। यह आदत झूठी उम्मीद और बेवजह डर, दोनों से बचाती है।
रोज़ की ज़िंदगी में
कोई वीडियो कहे कि यह सुर सुनने से यह हो जाएगा, तो आप जानते हैं कि क्या पूछना है। और साँस, जो दिन भर बिना पूछे चलती है, उस पर कभी कभी एक नज़र।
ध्यान में
मंत्र का असर ढूँढ़ना हो, तो उसे सुनने वाले के ध्यान में ढूँढ़िए, हवा में नहीं। ध्यान की बहुत सी परंपराएँ साँस को बिना बदले देखने से शुरू होती हैं, और नाद की परंपरा भीतर सुनने को कहती है। यह प्रयोग उस ओर इशारा करता है; अभ्यास नहीं सिखाता।
यहाँ जो दिखता है, वह नक़्शा और हिसाब है, किसी मंत्र का असर नहीं। अनुभव हर व्यक्ति का अपना होता है; कोई प्रयोग उसका वादा नहीं करता।
आवाज़ ख़बर लाती है, ताक़त सुनने वाला देता है। इस प्रयोग में किसी मंत्र या सुर से इलाज का दावा नहीं; हर अंक के साथ लिखा है कि वह कितना पक्का है।
साँस की घड़ी में कोई साँस रोकना नहीं, और कोई चाल अपनाने की ज़रूरत नहीं। चक्कर आए तो रुकिए; साँस, दिल या रक्तचाप की बीमारी हो, तो पहले डॉक्टर से पूछिए। आवाज़ सिर्फ़ “सुनिए” दबाने पर, धीमे बजती है।
आवाज़ की परख पर सवाल जवाब
क्या आवाज़ से आग, बारिश या पत्थर पर असर हो सकता है?
नाददूत का हिसाब कहता है कि आवाज़ में काम करने लायक़ ताक़त बहुत कम होती है: बातचीत लगभग 0.00001 वाट की है, और उस ताक़त से एक घन मीटर मिट्टी आधा मीटर उठाने में लगभग 25 साल लगेंगे। पर आवाज़ उस चीज़ को छेड़ सकती है जो पहले से किनारे पर खड़ी हो: हिलती हुई आग 90 डेसिबल पर बुझ गई, जबकि स्थिर आग को 114 चाहिए थे।
अजपा क्या है?
योग के ग्रंथ कहते हैं कि बाहर जाती साँस के साथ एक हल्का “ह” और भीतर आती साँस के साथ “स” चलता है, जिसे हंस कहते हैं। इसे कोई जपता नहीं, इसलिए यह अजपा है; घेरंड संहिता के अनुसार दिन रात में 21,600 बार, यानी 15 प्रति मिनट। यह ग्रंथ की गिनती है, नापी हुई नहीं।
क्या ॐ गाने से श्रीयंत्र बनता है?
इसका कोई छपा प्रयोग नहीं मिलता: न प्रयोग करने वाले का नाम, न तारीख़। रेत की प्लेट पर चित्र तभी बनते हैं जब प्लेट को सीधे हिलाया जाए; हवा में गाया सुर यह नहीं करता।
136.1 हर्ट्ज़ और 432 हर्ट्ज़ क्या हैं?
136.1 हर्ट्ज़ धरती के साल की “आवृत्ति” को 32 बार दोगुना करने का गणित है; हर कोई ॐ अपने ही सुर में जपता है। 432 हर्ट्ज़ को ब्रह्मांड की आवृत्ति कहना ठीक नहीं: इतनी बारीक़ी से सुर मिलाना 1830 के दशक से पहले संभव ही नहीं था।
यह सब किताब में
आवाज़ और मंत्र सच में क्या कर सकते हैं, और क्या नहीं, यह तीसरी किताब नाददूत में है: ग्रंथ, कथा और प्रयोग, तीनों तराज़ुओं पर। मनु प्रयोगशाला के बाक़ी प्रयोग
Testing sound, in English
Three parts from Naaddoot, the third book: the ajapa clock, where a ring round the figure of light follows the breath's ha and sa and the day's 21,600 breaths fill a grid of 60 by 360; the scale of sound, from a whisper to an opera singer's peak beside a man with a shovel, with how long each would take to lift soil or make rain; and a simulated sand plate where patterns form only while the plate is touched. Sound brings the message; the listener supplies the power.