आकाश खुल रहा है…
शरीर में ब्रह्मांड
क्या दिखे, क्या नहीं
यह प्रयोग क्यों
पुरुष सूक्त से शिव संहिता तक ग्रंथ बार बार कहते हैं कि जो बाहर है, वह भीतर भी है: आँख में सूरज, मन में चाँद, हृदय में आकाश। ये वाक्य पढ़ने में सुंदर हैं, पर इनकी कल्पना कठिन है। यह प्रयोग हर ऐसे श्लोक को एक दृश्य बनाता है, और श्लोक साथ में रखता है।
क्या करें
- “पूरी यात्रा” दबाइए और बस देखते रहिए; हर दृश्य के साथ उसका श्लोक और सीधा अर्थ आता है।
- कोई एक श्लोक चुनकर उस दृश्य पर रुकिए, और आकृति को घुमाकर देखिए।
- ऊपर की सीढ़ी से दूर जाइए: शरीर एक तारा बन जाता है, फिर आकाशगंगाओं के बीच खो जाता है।
क्या देखिए
- पुरुष सूक्त में जगत शरीर से बनता है; ऐतरेय उपनिषद में वही देवता लौटकर अंगों में समाते हैं। एक ही बात, दो दिशाएँ।
- जहाँ दो ग्रंथ अलग बात कहते हैं (सूरज नाभि पर या मेरु की जड़ में), वहाँ दोनों अपने नाम से दिखते हैं।
- हृदय के भीतर का आकाश, जिसे छान्दोग्य उपनिषद बाहर के आकाश जितना बड़ा कहता है।
इससे क्या मिलता है
ग्रंथों को उनकी अपनी भाषा में पढ़ने का रास्ता। हर दृश्य के साथ श्लोक और हवाला है, इसलिए आप किसी की कही बात पर नहीं, पाठ पर भरोसा कर सकते हैं।
रोज़ की ज़िंदगी में
अपने शरीर को अलग थलग नहीं, धूप, हवा, पानी और अन्न से बना और उन्हीं में लौटता हुआ देखना। पुराने लोग इस दृष्टि को रोज़ जीते थे; सुबह की धूप या एक गिलास पानी भी इस नज़र से थोड़ा अलग दिखता है।
ध्यान में
ध्यान की कई पुरानी विधियाँ एक दृश्य पर मन टिकाने से शुरू होती हैं। छान्दोग्य उपनिषद (8.1) की दहर विद्या हृदय के भीतर के आकाश पर ही ध्यान है। ग्रंथ का वर्णन आँख के सामने एक बार बन जाए, तो आँखें बंद करके उसे याद करना आसान होता है। ये ग्रंथों के वर्णन हैं, विज्ञान के दावे नहीं।
यहाँ जो दिखता है, वह नक़्शा और हिसाब है, किसी मंत्र का असर नहीं। अनुभव हर व्यक्ति का अपना होता है; कोई प्रयोग उसका वादा नहीं करता।
यह दृश्य क्या दिखाता है
पुराने ग्रंथ जगत को एक शरीर की तरह देखते हैं, और शरीर को एक जगत की तरह। यहाँ आकाशगंगाओं के बीच तारों से बनी एक विशाल खड़ी आकृति है, विराट पुरुष, और उसके हृदय में एक छोटी, ध्यान में डूबी रोशनी की आकृति। हर दृश्य किसी एक श्लोक को चित्र बनाता है: किस अंग से क्या निकला, या कौन सा लोक किस अंग में है। “पूरी यात्रा” सारे दृश्य एक के बाद एक चलाती है, बाहर के आकाश से शुरू होकर हृदय के भीतर के आकाश तक।
हर दृश्य के साथ श्लोक संस्कृत में, उसका सीधा अर्थ, और हवाला है। श्लोक छपे संस्करणों के ई पाठों से लिए गए हैं और शब्द दर शब्द मिलाए गए हैं।
- हज़ार सिर वाला पुरुष, ऋग्वेद 10.90.1
- पुरुष के अंगों से बना जगत, ऋग्वेद 10.90.13 और 14
- विराट के अंगों में चौदह लोक, श्रीमद्भागवत 2.1.26 से 28
- विराट के शरीर में आकाश, समुद्र और पहाड़, श्रीमद्भागवत 2.1.29 से 34
- चौदह लोक, दूसरे ढंग से, श्रीमद्भागवत 2.5.36, और 38 से 42
- अंगों से देवता निकले, ऐतरेय उपनिषद 1.1.4
- देवता लौटकर अंगों में समाए, ऐतरेय उपनिषद 1.2.4
- अग्नि सिर, चाँद और सूरज आँखें, मुण्डक उपनिषद 2.1.4
- स्कम्भ का शरीर, अथर्ववेद 10.7.32 से 34
- सूरज का पुरुष और आँख का पुरुष, बृहदारण्यक उपनिषद 5.5.2 और 3
- सूरज, देवताओं का मधु, छान्दोग्य उपनिषद 3.1.1 और 2
- हृदय के पाँच दरवाज़े, छान्दोग्य उपनिषद 3.13
- हृदय के भीतर का आकाश, छान्दोग्य उपनिषद 8.1.3
- सूरज की किरणें, हृदय की नाड़ियाँ, छान्दोग्य उपनिषद 8.6
- शरीर में मेरु और सात द्वीप, शिव संहिता 2.1 से 5
- मेरु की चोटी पर चाँद, जड़ में सूरज, शिव संहिता 2.6 से 11
- नाभि में सूरज, तालु में चाँद, हठयोग प्रदीपिका 3.77 से 79
- साँस में आकाश, शरीर में तीर्थ, दर्शन उपनिषद 4.39 से 49
ये ग्रंथों के वर्णन हैं, विज्ञान के दावे नहीं। आकाश, तारे और आकृतियाँ उन्हें देखने की जगह हैं; जहाँ दो ग्रंथ अलग बात कहते हैं, वहाँ दोनों अपने अपने नाम से दिखाए गए हैं।
यहाँ कोई अभ्यास नहीं सिखाया जाता। साँस रोकने वाले और उलटी मुद्रा वाले अभ्यास किताब से पढ़कर नहीं, किसी अनुभवी गुरु की देखरेख में ही किए जाते हैं।
शरीर में ब्रह्मांड पर सवाल जवाब
शरीर में ब्रह्मांड का विचार किन ग्रंथों में है?
ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (10.90) में पुरुष के मन से चाँद, आँख से सूरज, साँस से हवा, नाभि से बीच का आकाश, सिर से ऊपर का आकाश और पैरों से धरती बनती है। ऐतरेय उपनिषद में अंगों से देवता निकलते हैं और फिर लौटकर उन्हीं अंगों में समाते हैं। श्रीमद्भागवत (2.1.26 से 28) चौदह लोकों को विराट पुरुष के अंगों पर रखता है, और छान्दोग्य उपनिषद (8.1.3) कहता है कि हृदय के भीतर का आकाश बाहर के आकाश जितना बड़ा है।
विराट पुरुष क्या है?
पुराणों और उपनिषदों में पूरा जगत एक विशाल शरीर की तरह देखा गया है, जिसे विराट पुरुष कहते हैं। श्रीमद्भागवत में उसके तलवों में पाताल है और सिर में सत्यलोक, और बीच के लोक नीचे से ऊपर उसके अंगों में।
क्या यह विज्ञान है?
नहीं। ये ग्रंथों के वर्णन हैं, विज्ञान के दावे नहीं। यहाँ हर दृश्य किसी एक श्लोक से बना है, और उस श्लोक का पाठ और हवाला साथ में है, ताकि हर कोई ख़ुद पढ़कर देख सके।
शिव संहिता और हठयोग प्रदीपिका में सूरज और चाँद कहाँ हैं?
शिव संहिता (2.6 से 11) चाँद को मेरु की चोटी पर और सूरज को उसकी जड़ में रखती है। हठयोग प्रदीपिका (3.77 से 79) सूरज को नाभि पर और चाँद को तालु पर। दोनों ग्रंथ अलग अलग जगह बताते हैं।
पाठ कहाँ से
ऋग्वेद और अथर्ववेद: DharmicData (ODbL)। ऐतरेय और मुण्डक: indian-scriptures (MIT), GRETIL से मिलाकर। भागवत, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और हठयोग प्रदीपिका: GRETIL के ई पाठ। शिव संहिता और दर्शन उपनिषद: मुक्तबोध के ई पाठ (Tara Press 1928 और अड्यार 1920 के संस्करण)। श्लोक अपने आप में सबके हैं; संस्करणों के नाम उनके पाठ के लिए।
मंत्र का नक़्शा उसी आकाश में किसी भी मंत्र के अक्षरों को छह कमलों पर रखता है। मनु प्रयोगशाला के बाक़ी प्रयोग
The universe in the body, in English
A scene built verse by verse from the old texts that see the universe as a body: the Purusha Sukta (Rigveda 10.90), where the moon is born of the Purusha's mind and the sun of his eye; the Aitareya Upanishad, where the deities come out of the limbs and go back into them; the Bhagavata Purana's fourteen worlds on the limbs of the cosmic person; the Shiva Samhita's moon at the top of Meru and sun at its root; and the Chandogya Upanishad's space within the heart, as vast as the space outside. Each view carries its verse, a plain meaning and its reference. These are the texts' descriptions, not scientific claims.