पंचांग 2026

पंचांग 2026 · हर महीने का व्रत

पूर्णिमा व्रत 2026

Purnima Vrat 2026

पूरा चाँद। पाँच अध्याय। और प्रसाद, जो छोड़ा नहीं जाता।

अक्टूबर से दिसंबर 2026 में पूर्णिमा व्रत 3 बार आता है, हर पूर्णिमा को: 25 अक्टूबर, रविवार, 24 नवंबर, मंगलवार और 23 दिसंबर, बुधवार। हर तारीख़ की तिथि, चंद्रोदय और उस दिन की अपनी बात नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।

पूर्णिमा: उस रात पूरा चाँद

कड़ाही में आटा घी में भुन रहा है। गली के मोड़ तक उसकी महक जाती है।

केला, घी, दूध, आटा, गुड़। आज हर चीज़ सवाई तौली गई है।

आँगन में दरी बिछी है। पड़ोस की औरतें घेरा बनाकर टिकी हैं। पंडित जी पोथी खोलते हैं।

चौथे अध्याय पर एक बच्ची धीरे से पूछती है: उस लड़की ने प्रसाद क्यों छोड़ा?

कोई जवाब नहीं देता। कथा आगे बढ़ती है, और नाव डूब जाती है।

कथा पूरी होती है तो मुँडेर के ऊपर चाँद आ चुका है। एक लोटा जल उसकी ओर उठता है।

दिन भर किसी ने अन्न नहीं खाया। अब पहला कौर प्रसाद का है।

चाँद हर महीने वही। पर हर बार उसका नाम नया, और हर नाम के पीछे एक कथा।

2026 में कब

पूर्णिमा व्रत 2026: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

अक्टूबर25

नवंबर24

दिसंबर23

अगले बरस की हर तारीख़: पूर्णिमा व्रत 2027

मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar

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सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट या कभी एक दिन का फ़र्क़ हो सकता है। शुभ काम का समय अपने पंडित जी से पक्का कर लें।

पहचान

पूर्णिमा व्रत क्या है

पूर्णिमा चाँद के शुक्ल पक्ष का आख़िरी दिन है, जिस रात चाँद पूरा होता है। दक्षिण भारत में इसे पौर्णमी कहते हैं और इसके व्रत को पौर्णमी व्रतम्। यह व्रत सूरज निकलने से चाँद दिखने तक रखा जाता है, इसलिए इसका नियम चाँद से बँधा है: व्रत उस दिन होता है जिस दिन पूर्णिमा तिथि चाँद के साथ हो, यानी शाम को चाँद निकलते समय पूर्णिमा चल रही हो। पूर्णिमा का स्नान और दान दूसरे नियम से चलता है: वह उदया तिथि से होता है, यानी उस सुबह जब सूरज निकलते समय पूर्णिमा हो। इसीलिए कई बार व्रत एक दिन पड़ता है और स्नान दान अगली सुबह। पंचांगों में नियम है कि अगर पूर्णिमा पिछले दिन दोपहर के समय शुरू हो जाए, तो व्रत उसी दिन, यानी चतुर्दशी वाली तारीख़ को, रखा जाता है। बहुत से घरों में इस दिन सत्यनारायण की कथा होती है, और विष्णु, लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा। साल में बारह पूर्णिमा आती हैं और हर एक का अपना नाम है; इस पन्ने की सूची पौष से मार्गशीर्ष तक चलती है। व्रत का दिन, चाँद निकलने की घड़ी और स्नान दान की सुबह, तीनों यह पन्ना हर तारीख़ के साथ ऊपर ख़ुद दिखाता है।

पूरी सूची

पूर्णिमा व्रत 2026: हर तारीख़

हर तारीख़, उस दिन की तिथि कब से कब तक, चंद्रोदय का समय, और उस दिन की अपनी बात।

  1. 25अक्टूबर

    शरद पूर्णिमा

    आश्विन पूर्णिमा · तिथि 25 अक्टूबर, सुबह 11:57 से 26 अक्टूबर, सुबह 9:42 तक

    मान्यता है कि साल में बस इसी रात चाँद अपनी सोलहों कलाओं के साथ निकलता है, इसलिए खीर रात भर चाँदनी में रखी जाती है। इसे कोजागरा भी कहते हैं, ब्रज में रास पूर्णिमा, और इसी दिन वाल्मीकि जयंती है, जिसका अपना पन्ना है। साल भर का पूर्णिमा व्रत इसी पूर्णिमा से शुरू किया जाता है।

    चंद्रोदय: शाम 4:56

    + यह दिन कैलेंडर में

  2. 24नवंबर

    कार्तिक पूर्णिमा

    कार्तिक पूर्णिमा · तिथि 23 नवंबर, रात 11:43 से 24 नवंबर, रात 8:24 तक

    कार्तिक पूर्णिमा, काशी की देव दीपावली और गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व, तीनों इसी दिन हैं, और तीनों के अपने पन्ने हैं। उत्तर की पूर्णिमांत गिनती में कार्तिक का महीना आज पूरा होता है।

    चंद्रोदय: शाम 4:57

    + यह दिन कैलेंडर में

  3. 23दिसंबर

    मार्गशीर्ष पूर्णिमा

    मार्गशीर्ष पूर्णिमा · तिथि 23 दिसंबर, सुबह 10:48 से 24 दिसंबर, सुबह 6:58 तक

    अगहन की पूर्णिमा पर दत्तात्रेय जयंती है, जिसे दत्त जयंती भी कहते हैं, और इसका अपना पन्ना है। यह इस सूची का आख़िरी पूरा चाँद है; इसके बाद फिर पौष आता है।

    चंद्रोदय: शाम 4:37

    + यह दिन कैलेंडर में

कथा

पूर्णिमा व्रत की कथा

यह सत्यनारायण की कथा है, जो पूर्णिमा की शाम घर घर पढ़ी जाती है। इसके संस्कृत पाठ के हर अध्याय के अंत में लिखा है कि यह स्कंद पुराण के रेवा खंड की कथा है। पर पुराण की सारी छपी पोथियों में यह नहीं मिलती, और कुछ लोग इसे भविष्य पुराण से भी जोड़ते हैं; सो इसे परंपरा की कथा मानकर सुनिए। कथा शुरू होती है नैमिषारण्य में, जहाँ शौनक और दूसरे ऋषि सूत जी से पूछते हैं। सूत जी बताते हैं: एक बार नारद घूमते हुए धरती पर आए और देखा कि लोग अपने कर्मों का दुख भोग रहे हैं। वे विष्णु के पास गए और पूछा, इनके लिए कोई सीधा रास्ता है? विष्णु ने सत्यनारायण का व्रत बताया: किसी भी दिन, भक्ति से, दिन ढलते समय यह पूजा करो। संस्कृत पाठ में आता है: 'नैवेद्यं भक्तितो दद्यात् सपादं भक्ष्यमुत्तमम्। रम्भाफलं घृतं क्षीरं गोधूमस्य च चूर्णकम्॥' यानी भक्ति से सवाया भोग चढ़ाओ: केला, घी, दूध और गेहूँ का आटा। फिर कथा, भजन, और सबको खिलाना।

दूसरा अध्याय काशी का है। वहाँ एक बहुत ग़रीब ब्राह्मण भीख माँगकर दिन काटता था। भगवान एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप लेकर उसके पास आए और उसे यही व्रत बताया। ब्राह्मण ने उस दिन की भीख से पूजा की, और उसके दिन फिर गए। एक लकड़हारा उसके घर के पास से निकला, पूजा देखी, पूछा कि यह क्या है, और ठान लिया कि अगली बार लकड़ी बिकेगी तो वह भी यह व्रत करेगा। उस दिन लकड़ी अच्छे दाम पर बिकी, और उसने भी अपने घर वालों के साथ पूजा की।

तीसरे अध्याय में भद्रशीला नदी के किनारे राजा उल्कामुख और उनकी रानी यह व्रत कर रहे थे। उधर से नाव लेकर साधु नाम का एक बनिया निकला। उसके कोई संतान नहीं थी। उसने मन्नत मानी: संतान होगी तो मैं भी यह व्रत करूँगा। उसकी पत्नी लीलावती ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम कलावती रखा गया। पर साधु हर बार पूजा टालता रहा। कलावती बड़ी हुई, कंचन नगर के एक बनिये के बेटे से उसका ब्याह हुआ, और साधु उस दिन भी व्रत भूल गया। फिर ससुर और दामाद व्यापार करने रत्नसारपुर गए, जहाँ राजा चंद्रकेतु का राज था। एक चोर ने राजा का धन चुराकर उनकी नाव में छिपा दिया, और दोनों चोर ठहराकर जेल में डाल दिए गए। इधर घर में भी चोरी हो गई और लीलावती और कलावती भूखों मरने लगीं। एक दिन कलावती ने एक घर में यही पूजा होते देखी, प्रसाद लिया, और लौटकर माँ को बताया। लीलावती ने व्रत किया और भूल की माफ़ी माँगी। उसी रात राजा चंद्रकेतु को सपना आया, और सुबह उसने दोनों को छोड़ दिया, धन भी लौटा दिया।

चौथे अध्याय में साधु घर लौट रहा था। रास्ते में भगवान एक दंडी संन्यासी बनकर आए और पूछा, नाव में क्या है? साधु ने हँसी उड़ाते हुए कहा: बस बेलें और पत्ते। संन्यासी बोले, ऐसा ही हो। साधु ने नाव में झाँका तो सचमुच बेलें और पत्ते भरे थे, और वह बेहोश हो गया। दामाद ने कहा, यह उन्हीं की लीला है, उनकी शरण में चलिए। साधु ने माफ़ी माँगी, और धन लौट आया। ख़बर घर पहुँची। लीलावती पूजा कर रही थी, और उसने कलावती से कहा, प्रसाद लेकर आना। पर पति को देखने की जल्दी में कलावती प्रसाद छोड़कर किनारे दौड़ गई। उसी पल नाव पति समेत आँखों से ओझल हो गई। कलावती ने वहीं जान देने की ठान ली। तब बात खुली कि वह प्रसाद छोड़कर आई है। वह लौटी, श्रद्धा से प्रसाद खाया, और नाव फिर किनारे आ लगी। संस्कृत पाठ कहता है: 'पौर्णमास्यां च सङ्क्रान्तौ कृतवान् सत्यस्य पूजनम्', यानी उसके बाद साधु हर पूर्णिमा और हर संक्रांति को यह पूजा करने लगा।

पाँचवाँ अध्याय राजा तुंगध्वज का है। शिकार से लौटते हुए वह एक बड़ के पेड़ के नीचे रुका, जहाँ ग्वाले अपने भाई बंधुओं के साथ सत्यनारायण की पूजा कर रहे थे। घमंड में राजा न पूजा की जगह गया, न प्रणाम किया, और ग्वालों का दिया प्रसाद वहीं छोड़कर नगर चला गया। नगर पहुँचा तो सब उजड़ा मिला; कई पाठों में उसका धन ही नहीं, सौ बेटे भी चले गए। राजा समझ गया, लौटा, ग्वालों के साथ पूजा की और प्रसाद लिया, और सब पहले जैसा हो गया। कथा के आख़िर में बताया जाता है कि आगे ये लोग किस जन्म में गए: काशी का वह ग़रीब बूढ़ा ब्राह्मण, शतानंद, सुदामा बना, लकड़हारा निषाद, साधु बनिया मोरध्वज, और राजा उल्कामुख दशरथ होकर बैकुंठ गए। यानी पूर्णिमा की यह कथा रामकथा के दरवाज़े पर आकर रुकती है।

व्रत

पूर्णिमा व्रत का व्रत कैसे रखें

  1. सुबह भगवान के आगे व्रत का संकल्प लिया जाता है, यानी मन में पक्का किया जाता है कि आज पूर्णिमा का व्रत है।
  2. व्रत सूरज निकलने से चाँद दिखने तक चलता है।
  3. दिन भर उपवास रहता है, और हर कोई उसे अपनी ताक़त और सेहत के हिसाब से निभाता है।
  4. शाम को जब कथा हो, तो उसे पूरा सुनकर ही उठते हैं।
  5. व्रत चाँद को अर्घ्य देने के बाद ही खुलता है, और पहला कौर प्रसाद का होता है।
  6. जो साल भर हर पूर्णिमा का व्रत रखने का संकल्प लेते हैं, वे इसकी शुरुआत आश्विन की शरद पूर्णिमा से करते हैं; नई ब्याहताएँ ख़ास तौर पर इसी दिन से शुरू करती हैं।

पारण: व्रत कैसे खोलें

पूर्णिमा का व्रत चाँद से खुलता है। व्रत सूरज निकलने से चाँद दिखने तक चलता है, इसलिए चाँद निकलने के बाद उसकी पूजा करके और उसे जल का अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। बहुत से घरों में यह शाम की सत्यनारायण कथा के बाद होता है, और पहला कौर कथा के प्रसाद का होता है। जिस बार व्रत चतुर्दशी वाली तारीख़ को पड़ता है, उस बार पारण उसी रात चाँद को अर्घ्य देकर हो जाता है, और नदी का स्नान और दान अगली सुबह, उदया पूर्णिमा में, होता है। चाँद निकलने की घड़ी यह पन्ना हर तारीख़ के लिए ऊपर छापता है।

कहाँ कैसे

पूर्णिमा व्रत कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • प्रयाग का संगम

    माघ भर लोग भोर में गंगा या यमुना में नहाते हैं, और माघ की पूर्णिमा पर यह स्नान पूरा होता है। उसी दिन संगम किनारे महीने भर का कल्पवास, यानी वहीं रहकर तप का नियम, भी ख़त्म होता है।

  • दक्षिण भारत

    यहाँ पूरे चाँद का दिन पौर्णमी कहलाता है, और उसका व्रत पौर्णमी व्रतम्। व्रत सूरज निकलने से चाँद दिखने तक चलता है।

  • बंगाल और महाराष्ट्र

    सत्यनारायण की पूजा इन दोनों जगहों में घर घर की पूजा है। बिहार और उत्तर भारत में सत्यनारायण को सीधे विष्णु का रूप मानकर पूजा जाता है।

  • ब्रज और गुजरात

    आश्विन की पूर्णिमा ब्रज में रास पूर्णिमा है, कृष्ण के महारास की रात, और गुजरात में यही शरद पूनम कहलाती है। इस रात खीर चाँदनी में रखी जाती है और अगली सुबह प्रसाद की तरह बाँटी जाती है।

रीत

पूर्णिमा व्रत के दिन क्या करते हैं

  1. सुबह जल्दी उठकर नहाया जाता है; हो सके तो किसी पवित्र नदी में, और पूर्णिमा के स्नान, दान और पूजा को बहुत पुण्य का माना जाता है।
  2. दिन में विष्णु, लक्ष्मी और सत्यनारायण की पूजा होती है।
  3. शाम को, दिन ढलते, सत्यनारायण की कथा होती है: पाँच अध्याय, क्रम से, घर वालों और पड़ोसियों के बीच।
  4. भोग सवाया बनता है, यानी हर चीज़ सवा गुनी: केला, घी, दूध और गेहूँ का आटा, साथ में गुड़।
  5. कथा के बाद प्रसाद हर किसी को दिया जाता है, और कोई उसे मना नहीं करता; कलावती और राजा तुंगध्वज की कथा यही याद दिलाती है।
  6. चाँद निकलने पर चंद्र देव की पूजा होती है, और लोटे से उन्हें जल चढ़ाया जाता है, जिसे अर्घ्य कहते हैं।
  7. ज़रूरतमंदों को अपनी ताक़त के हिसाब से दान दिया जाता है।

रसोई

पूर्णिमा व्रत का खाना

  • सवाया प्रसाद केला, घी, दूध, गेहूँ का आटा और गुड़ मिलाकर बना भोग, जो कथा के बाद बँटता है।
  • खीर शरद पूर्णिमा की रात चाँदनी में रखी जाती है और सुबह प्रसाद बनती है।

सवाल जवाब

पूर्णिमा व्रत 2026: पूछे जाने वाले सवाल

पूर्णिमा व्रत अक्टूबर से दिसंबर 2026 में कब कब है?

अक्टूबर से दिसंबर 2026 में पूर्णिमा व्रत 3 बार आता है, हर पूर्णिमा को: 25 अक्टूबर, रविवार, 24 नवंबर, मंगलवार और 23 दिसंबर, बुधवार। हर तारीख़ की तिथि, चंद्रोदय और उस दिन की अपनी बात नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।

पूर्णिमा का व्रत कब से कब तक रखते हैं?

सूरज निकलने से चाँद दिखने तक। चाँद निकलने पर उसकी पूजा करके और अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।

पूर्णिमा का स्नान दान व्रत से अगले दिन क्यों होता है?

क्योंकि दोनों के नियम अलग हैं। व्रत उस दिन होता है जब शाम को चाँद के साथ पूर्णिमा हो, और स्नान दान उदया तिथि से, यानी उस सुबह जब सूरज निकलते समय पूर्णिमा हो। जब दोनों बातें एक दिन न मिलें, तो व्रत पहले दिन और स्नान दान अगले दिन पड़ता है।

क्या पूर्णिमा का व्रत चतुर्दशी को रखा जाता है?

कभी कभी, हाँ। पंचांगों का नियम है कि जब पूर्णिमा पिछले दिन दोपहर के समय शुरू हो जाए, तो व्रत उसी दिन रखा जाता है, जो पंचांग में चतुर्दशी की तारीख़ होती है। इसीलिए पौर्णमी व्रत और सत्यनारायण पूजा कई बार पूर्णिमा से एक दिन पहले आते हैं।

सत्यनारायण की कथा किस दिन करनी चाहिए?

संस्कृत पाठ में विष्णु कहते हैं कि यह पूजा किसी भी दिन, दिन ढलते समय, भक्ति से की जा सकती है। कथा में ही साधु बनिया इसे हर पूर्णिमा और हर संक्रांति पर करने लगता है, इसीलिए पूर्णिमा इसका सबसे जाना माना दिन है।

पूर्णिमा का व्रत किस पूर्णिमा से शुरू करें?

जो साल भर हर पूर्णिमा का व्रत रखना चाहते हैं, वे आश्विन की शरद पूर्णिमा से शुरू करते हैं। नई ब्याहताओं के लिए यही दिन बताया गया है।

साल में कितनी पूर्णिमा होती हैं?

हर महीने एक, यानी साल में बारह, और हर एक का अपना नाम है: माघी, गुरु पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, और बाक़ी। हर पूर्णिमा की अपनी बात नीचे की सूची में है।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Shri Satyanarayana Vratakatha, Sanskrit text (sanskritdocuments.org)पाँचों अध्यायों का संस्कृत पाठ, रेवा खंड वाली पंक्ति, सवाया भोग का श्लोक, पूर्णिमा और संक्रांति वाला श्लोक, सारे नाम
  2. श्री सत्यनारायण कथा, पंचम अध्याय (Bhakti Bharat)राजा तुंगध्वज, बड़ का पेड़ और ग्वाले, अगले जन्मों की सूची
  3. Satyanarayana Puja (Wikipedia)स्कंद पुराण की छपी पोथियों में फ़र्क़, भविष्य पुराण, बंगाल और महाराष्ट्र, उत्तर भारत में विष्णु का रूप, गुड़ वाला भोग
  4. Drik Panchang: Pournami Fasting Daysपौर्णमी व्रतम्, सूरज निकलने से चाँद दिखने तक, चतुर्दशी को व्रत का नियम
  5. ज्येष्ठ पूर्णिमा पर व्रत और स्नान के दिन अलग (Navbharat Live)चंद्रव्यापिनी पूर्णिमा में व्रत, उदया तिथि में स्नान दान, चाँद को अर्घ्य, जेठ की रात लक्ष्मी पूजा
  6. पूर्णिमा तिथियाँ (Shubh Panchang)सुबह स्नान, विष्णु लक्ष्मी और सत्यनारायण की पूजा, कथा के बाद व्रत खोलना
  7. Drik Panchang: Magha Purnimaमाघ भर का स्नान, कल्पवास का आख़िरी दिन, रविदास जयंती, ताक़त के हिसाब से दान
  8. Drik Panchang: Sharad Purnimaसोलह कलाएँ, चाँदनी में खीर, कोजागरा, रास पूर्णिमा, शरद पूनम, साल भर के पूर्णिमा व्रत की शुरुआत

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2026 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।