पंचांग 2026

पंचांग 2026 · आश्विन कृष्ण अष्टमी

जितिया व्रत 2026

Jitiya (Jivitputrika Vrat) 2026

एक माँ भूखी प्यासी। एक राजा, जिसने किसी और के बेटे के लिए अपना शरीर दे दिया।

जितिया व्रत 2026 में 3 अक्टूबर, शनिवार को है। आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर, सुबह 8:00 से 4 अक्टूबर, सुबह 5:52 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

उस शाम का चाँद, 50 प्रतिशत रोशन

भोर से पहले, अँधेरे में, छत पर एक पत्ता आकर गिरता है।

उस पर थोड़ा दही, चूड़ा, केले का एक टुकड़ा। यह चील के हिस्से का है।

नीचे आँगन में माँ जल्दी जल्दी आख़िरी कौर ले रही है। इसके बाद न अन्न, न पानी।

दिन में मिट्टी और गोबर से दो छोटी मूरतें बनती हैं। एक चील, एक सियारिन।

उनके बीच कुश का बना एक राजा है, जीमूतवाहन।

बच्चा पूछता है, सियारिन को क्यों पूजती हो, उसने तो व्रत तोड़ा था?

माँ कहती है, शाम को कथा सुनना। उसमें एक राजा है जो किसी और की माँ का बेटा बचाने चला गया था।

2026 में कब

जितिया व्रत 2026: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़3 अक्टूबर, शनिवार

तिथिआश्विन कृष्ण अष्टमी3 अक्टूबर, सुबह 8:00 से 4 अक्टूबर, सुबह 5:52 तक

नक्षत्रआर्द्रासूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 6:15

सूर्यास्तशाम 6:05

चंद्रोदयरात 11:27

अगले बरस जितिया व्रत 23 सितंबर 2027, गुरुवार को है: जितिया व्रत 2027, तारीख़ और मुहूर्त

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पहचान

जितिया व्रत क्या है

जितिया, जिसका पूरा नाम जीवित्पुत्रिका व्रत है, आश्विन के कृष्ण पक्ष की अष्टमी का व्रत है, जैसा उत्तर भारत का पूर्णिमांत कैलेंडर गिनता है; अमांत कैलेंडर में यही दिन भादों कृष्ण की अष्टमी है। माँएँ यह व्रत अपने बेटों और बच्चों की लंबी उम्र और सलामती के लिए रखती हैं, और अष्टमी का दिन निर्जला होता है, यानी पानी की एक बूँद भी नहीं। व्रत तीन दिन चलता है: सप्तमी को नहाय खाय, अष्टमी को निर्जला व्रत, जिसे खुर जितिया या खर जितिया भी कहते हैं, और नवमी को पारण। इसे बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बंगाल में रखते हैं, और नेपाल के तराई में मिथिला, भोजपुर और थारू लोगों के बीच भी। यह पितृ पक्ष के भीतर पड़ता है, और कैलेंडर में इसी दिन कालाष्टमी भी दिखती है। बिहार और झारखंड की बोली में इसे जिउतिया भी कहते हैं।

कथा

जितिया व्रत की कथा

इस व्रत की कथा कथा के भीतर चलती है। कहते हैं, कलियुग में माँओं को अपने बच्चों की चिंता हुई तो वे गौतम ऋषि के पास गईं। गौतम ने उन्हें महाभारत के समय की बात सुनाई। अठारह दिन की लड़ाई के बाद पांडव अपने मरे हुए बेटों के दुख में डूबे थे, और द्रौपदी ने धौम्य ऋषि से पूछा कि अब क्या करें। तब धौम्य ने सतयुग की एक कथा सुनाई।

जीमूतवाहन गंधर्वों के राजकुमार थे, राज के असली हक़दार, पर उन्हें राज का कोई मोह नहीं था। जब उनके पिता वानप्रस्थ के लिए जंगल गए, तो जीमूतवाहन राज भाइयों को सौंपकर पिता की सेवा करने जंगल चले गए, और वहीं उनका ब्याह मलयवती से हुआ। एक दिन उन्होंने एक बूढ़ी औरत को रोते सुना। वह नाग कुल की थी। गरुड़ हर दिन एक नाग को खाते थे, और आज उसके इकलौते बेटे शंखचूड़ की बारी थी।

जीमूतवाहन ने कहा, तुम्हारा बेटा नहीं जाएगा, मैं जाऊँगा। उन्होंने नाग के लिए रखा कपड़ा अपने ऊपर लपेटा और उस शिला पर लेट गए जहाँ गरुड़ आते थे। गरुड़ आए और उन्हें चोंच में दबाकर ले उड़े, पर देखा कि यह शिकार न डरता है, न दया माँगता है। गरुड़ रुक गए और पूछा, तुम कौन हो? जीमूतवाहन ने कहा, माँ के लिए कोई बच्चा मामूली नहीं होता, और बच्चा खोने से बड़ा दुख कोई नहीं। गरुड़ का मन पिघल गया। जीमूतवाहन के माँगने पर उन्होंने उन सबकी हड्डियों पर अमृत छिड़का जिन्हें वे खा चुके थे, और सब जी उठे; फिर वचन दिया कि अब नागों की बलि नहीं लेंगे। गरुड़ ने यह भी कहा कि जो माँ आश्विन कृष्ण की अष्टमी को कुश से पूजा करके व्रत रखेगी, उसकी संतान पर आँच नहीं आएगी। द्रौपदी ने यह सुनकर व्रत रखा, और तब से माँएँ इसे रखती आई हैं। यही कथा राजा हर्ष के संस्कृत नाटक नागानंद में भी है, जहाँ जीमूतवाहन विद्याधरों के राजकुमार हैं और राजा जीमूतकेतु के बेटे।

दूसरी कथा चील और सियारिन की है, और लोक में यही सबसे ज़्यादा सुनाते हैं। नर्मदा के पास एक जंगल में एक चील और एक सियारिन रहती थीं। कुछ औरतों को जितिया व्रत की बात करते सुना तो दोनों ने भी व्रत रखने की ठानी। दिन चढ़ा तो सियारिन से भूख सही नहीं गई, और उसने चुपके से एक मरे हुए जानवर का मांस खा लिया। चील ने यह देखा, पर ख़ुद नियम से व्रत पूरा किया। अगले जन्म में दोनों एक ही घर में बहनें बनकर जन्मीं: सियारिन बड़ी बहन कर्पूरावती बनी, जिसका ब्याह एक राजकुमार से हुआ, और चील छोटी बहन शीलावती, जिसका ब्याह एक ब्राह्मण से हुआ।

दोनों के सात सात बेटे हुए। शीलावती के सातों बेटे जीते रहे, और कर्पूरावती के बेटे जन्म के कुछ दिन बाद एक एक करके चल बसे। कर्पूरावती को जलन हुई, और उसने राजा से शीलावती के सातों बेटों के सिर माँग लिए। राजा ने मना किया, पर वह अड़ी रही, और सिर लाल कपड़े में लपेटकर बहन के घर भेजे गए। व्रत के पुण्य से कपड़ा खुला तो उसमें सिर नहीं, नारियल, कपड़े और फल निकले। तब शीलावती ने बहन को पिछला जन्म याद दिलाया: तुम सियारिन थीं और व्रत में मांस खाया था, मैं चील थी और व्रत पूरा किया था। कर्पूरावती ने भी विधि से जितिया रखा और उसे संतान का सुख मिला। नेपाल में यही कथा थोड़ी अलग सुनाते हैं: वहाँ दोनों कुंभ के मेले में मरती हैं, और शीलावती के बेटे फिर जी उठते हैं।

व्रत

जितिया व्रत का व्रत कैसे रखें

  1. सप्तमी को नहाय खाय: माँ नहाकर एक बार सादा, सात्विक खाना खाती है, घी और सेंधा नमक वाला।
  2. अष्टमी लगने से पहले, रात में या भोर से पहले, आख़िरी बार कुछ खा लेती है; उसके बाद व्रत शुरू होता है।
  3. अष्टमी को पूरा दिन और उसके बाद की रात निर्जला व्रत: न अन्न, न पानी का एक घूँट।
  4. जो माँ गर्भ से हो, बीमार हो, बूढ़ी हो या बच्चे को दूध पिलाती हो, वह फल और पानी वाला फलाहारी व्रत रख सकती है।
  5. व्रत के दिनों में प्याज़, लहसुन और मांस नहीं खाते; नेपाल और मिथिला में मछली बस पहले दिन, व्रत से पहले खाते हैं।

पारण: व्रत कैसे खोलें

व्रत अष्टमी तिथि ख़त्म होने के बाद ही खुलता है, इसलिए पारण आम तौर पर अगले दिन, नवमी को, सुबह की पूजा के बाद होता है। व्रती पहले सूरज को अर्घ्य देती है, उसके बाद ही अन्न लेती है, और फिर दान करती है। बिहार में पारण की थाली में नोनी साग और मड़ुआ की रोटी आती है। अगर अष्टमी दोपहर में लगे, तो व्रत दो दिनों में फैल सकता है। अष्टमी कब ख़त्म होती है, यह इसी पन्ने पर ऊपर दिया है।

कहाँ कैसे

जितिया व्रत कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश

    यहाँ व्रत तीन दिन का है। नहाय खाय के दिन माँएँ नहाकर घी और सेंधा नमक में बना शाकाहारी खाना खाती हैं, अष्टमी को निर्जला रहती हैं, और पारण पर नोनी साग और मड़ुआ की रोटी बनती है।

  • झारखंड

    यहाँ जितिया आठ दिन तक चलता है: बालू लाना, बीज बोना, जितिया की डाल गाड़ना और रात भर नाच। सप्तमी को नदी किनारे सियार और चील के लिए खाना रखते हैं, और आठ तरह की सब्ज़ी, अरवा चावल और मड़ुआ की रोटी खाते हैं; अष्टमी को पुआ और धुस्का बनते हैं।

  • नेपाल का तराई, मिथिला और भोजपुर

    पहले दिन औरतें पोखर में नहाकर सूरज को जल देती हैं, और जितमहान और गुज़र चुके सास ससुर और माँ बाप को सरसों का तेल, मिठाई और सिंदूर चढ़ाती हैं। यहाँ व्रत मछली और मड़ुआ की रोटी खाकर शुरू होता है। कुँवारी लड़कियाँ खर जितिया रखती हैं और ब्याही औरतें पूर्ण जितिया।

  • थारू लोग

    थारू औरतें जितिया पर झमटा नाम का अपना नाच नाचती हैं। उनकी अपनी लोक कथा में एक निःसंतान विधवा खेत का एक साग खा लेती है, और सूरज के तेज से उसके बेटा होता है, जितमहान, जो अष्टमी को जन्मा था।

रीत

जितिया व्रत के दिन क्या करते हैं

  1. मिट्टी और गाय के गोबर से चील और सियारिन की छोटी मूर्तियाँ बनाते हैं, और जीमूतवाहन के साथ उनकी पूजा करते हैं।
  2. कुश से जीमूतवाहन की मूर्ति बनती है, और उन्हें धूप, दीया, चावल और फूल चढ़ते हैं।
  3. पूजा में लाल धागा, फूल, धूप और फल चढ़ते हैं, और शाम को दीये के आगे व्रत की कथा पढ़ते या सुनते हैं।
  4. कई घरों में पहले सूर्य नारायण की मूर्ति को नहलाकर धूप दीये से आरती होती है और भोग लगता है।
  5. नेपाल में अष्टमी की भोर से पहले घिरौंला के पत्तों पर दही, चूड़ा, मिठाई, केला, खीरा और आम रखकर जितमहान, पुरखों और चील को चढ़ाते हैं; चील वाला पत्ता छत पर फेंक देते हैं।
  6. जितमहान और पुरखों वाले पत्ते का प्रसाद पति या बच्चों को खिलाते हैं।
  7. पारण के बाद दान करते हैं।

रसोई

जितिया व्रत का खाना

  • नोनी साग पारण का साग, जिसे कुलफ़ा भी कहते हैं।
  • मड़ुआ की रोटी रागी के आटे की रोटी, नहाय खाय और पारण दोनों में।
  • मछली नेपाल और मिथिला में व्रत से पहले के दिन, व्रत इसी से शुरू होता है।
  • पुआ और धुस्का झारखंड में अष्टमी को बनने वाले पकवान।

सवाल जवाब

जितिया व्रत 2026: पूछे जाने वाले सवाल

जितिया व्रत 2026 कब है?

जितिया व्रत 2026 में 3 अक्टूबर, शनिवार को है। आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर, सुबह 8:00 से 4 अक्टूबर, सुबह 5:52 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

क्या जितिया व्रत में पानी पी सकते हैं?

नहीं, अष्टमी का व्रत निर्जला है, पूरे दिन और रात पानी का एक घूँट भी नहीं। जो माँ गर्भ से हो, बीमार हो, बूढ़ी हो या दूध पिलाती हो, वह फल और पानी पर व्रत रख सकती है।

जितिया का पारण कब करें?

अष्टमी तिथि ख़त्म होने के बाद, आम तौर पर नवमी की सुबह। पहले सूरज को अर्घ्य दें, फिर अन्न लें, और पारण के बाद दान करें।

नहाय खाय में क्या खाते हैं?

नहाकर एक बार सादा शाकाहारी खाना, घी और सेंधा नमक में बना। नेपाल और मिथिला में इसी दिन मछली और मड़ुआ की रोटी खाते हैं।

जितिया व्रत कौन रख सकता है?

यह माँओं का व्रत है, बेटों और बच्चों की लंबी उम्र के लिए। नेपाल में कुँवारी लड़कियाँ भी खर जितिया रखती हैं, और ब्याही औरतें पूर्ण जितिया।

जितिया में चील और सियारिन की पूजा क्यों होती है?

लोक कथा में दोनों ने साथ व्रत रखा था: चील ने पूरा किया और सियारिन ने तोड़ दिया, और अगले जन्म में उसी हिसाब से फल मिला। इसीलिए शाम की पूजा में मिट्टी और गोबर से बनी उनकी मूर्तियाँ रखते हैं।

जीमूतवाहन कौन थे?

कथा के राजकुमार, जिन्होंने एक नाग माँ के इकलौते बेटे को बचाने के लिए ख़ुद को गरुड़ के आगे रख दिया। उनकी करुणा देखकर गरुड़ ने नागों को खाना छोड़ दिया, और इसी कथा से व्रत का नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Hindu Blog: Jivitputrika Vrat Katha, Story of Jitiyaगौतम, धौम्य और द्रौपदी वाली कथा, गरुड़ का अमृत और वरदान
  2. Astroyogi: Jitiya Vrat Kathaजीमूतवाहन का राज छोड़ना, नाग का कपड़ा, गरुड़ का रुकना
  3. Jitiya (Wikipedia, offline mirror)तीन दिन, खाना, झारखंड के आठ दिन, थारू का झमटा, नागानंद वाला रूप
  4. PanchangBodh: Jitiya Vratअष्टमी ख़त्म होने पर पारण, फलाहार की छूट, चील सियारिन की मूर्तियाँ, पितृ पक्ष
  5. Navbharat Live: जितिया व्रत की चील और सियारिन की कथाचील और सियारिन की पूरी कथा, कर्पूरावती और शीलावती
  6. Onlinekhabar: Jitia, a holy festival where mothers fast for the life of their sonsनेपाल के तराई की रीतें, घिरौंला के पत्ते, खर और पूर्ण जितिया, जितमहान की कथा
  7. Bhakti Bharat: जितियाकुश के जीमूतवाहन, गोबर की चील सियारिन, नवमी को सूरज को अर्घ्य देकर पारण, क्षेत्र

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2026 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।