आज · दिन का पंचांग · विक्रम संवत 2084 · वैशाख
17 मई 2027 का पंचांग
सोमवार · वैशाख शुक्ल द्वादशी
17 मई 2027, सोमवार को वैशाख शुक्ल द्वादशी है, शाम 4:29 तक; उसके बाद त्रयोदशी। नक्षत्र हस्त है, सुबह 11:29 तक। सूर्योदय सुबह 5:30 और सूर्यास्त शाम 7:06। राहु काल सुबह 7:12 से सुबह 8:54 तक है। इस दिन बकरीद, सोम प्रदोष व्रत है। समय नई दिल्ली के हैं।
त्योहार
इस दिन के त्योहार और व्रत
पंचांग
17 मई 2027 का पंचांग: तिथि, नक्षत्र, योग, करण
- तिथि
- वैशाख शुक्ल द्वादशीशाम 4:29 तक, फिर त्रयोदशी
- नक्षत्र
- हस्तसुबह 11:29 तक, फिर चित्रा
- योग
- सिद्धि18 मई, रात 1:11 तक, फिर व्यतीपात
- करण
- बालवशाम 4:29 तक
- वार
- सोमवार
- पक्ष
- शुक्ल पक्ष
- महीना
- वैशाख (पूर्णिमांत)अमांत गिनती में भी यही
- संवत
- विक्रम संवत 2084
- चंद्र राशि
- कन्यासूर्योदय के समय
- सूर्य राशि
- वृषभ
- सूर्योदय
- सुबह 5:30
- सूर्यास्त
- शाम 7:06
- चंद्रोदय
- शाम 4:17
- चंद्रास्त
- रात 3:04
मुहूर्त
इस दिन के शुभ मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त
- रात 3:54 से सुबह 4:42 तकसूर्योदय से पहले के 96 से 48 मिनट: ध्यान, पाठ और पढ़ाई का समय।
- अभिजित मुहूर्त
- सुबह 11:51 से दोपहर 12:45 तकदिन के ठीक बीच का मुहूर्त, नए काम के लिए अच्छा माना जाता है।
- विजय मुहूर्त
- दोपहर 2:34 से दोपहर 3:28 तकदिन के पंद्रह हिस्सों में ग्यारहवाँ।
इस दिन कब न शुरू करें
- राहु काल
- सुबह 7:12 से सुबह 8:54 तकइस समय नया काम शुरू नहीं करते।
- यमगंड
- सुबह 10:36 से दोपहर 12:18 तकइसे भी शुभ काम के लिए टालते हैं।
- गुलिक काल
- दोपहर 2:00 से दोपहर 3:42 तकदक्षिण भारत में इसे भी देखते हैं।
सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट का फ़र्क़ होगा। मई 2027 का पूरा महीना
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
कोई व्रत, कोई त्योहार अब छूटेगा नहीं
आज से दिसंबर 2027 तक के 334 त्योहार और व्रत, तिथि और मुहूर्त के साथ, सीधे आपके फ़ोन के कैलेंडर में। हर त्योहार के साथ उसका शुभकामना कार्ड भी, अपनों को WhatsApp पर भेजने के लिए। एक बार दबाइए, बस।
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- मुफ़्त
- कोई साइन अप नहीं
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इस दिन की रामकथा
कवितावली
ब्रजभाषा · उनतालीस में से एक
तुलसीदास की दूसरी रामकथा, मानस से अलग। यह ब्रजभाषा में है, कवित्त और सवैयों में, और पूरी कथा क्रम से नहीं चलती, चुने हुए दृश्य ज़ोर से कहे जाते हैं। इसका सुंदरकांड लंका दहन को बहुत फैलाकर कहता है, लंका के लोगों की आँख से। एक ही कवि, और दो बिल्कुल अलग कथाएँ।
