सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में · भारत में
कवितावली
Kavitavali
- भाषा ब्रजभाषा
- किसकी तुलसीदास
- कब सत्रहवीं सदी की शुरुआत
- कहाँ काशी
यह कथा
तुलसीदास की दूसरी रामकथा, मानस से अलग। यह ब्रजभाषा में है, कवित्त और सवैयों में, और पूरी कथा क्रम से नहीं चलती, चुने हुए दृश्य ज़ोर से कहे जाते हैं। इसका सुंदरकांड लंका दहन को बहुत फैलाकर कहता है, लंका के लोगों की आँख से। एक ही कवि, और दो बिल्कुल अलग कथाएँ।
एक नज़र में
कवितावली, अपनी लिपि में
कवितावली
- लिपि
- देवनागरी, ब्रजभाषा
- रूप
- अलग अलग कवित्त और सवैये, सात कांड; लगभग 325 पद
- समय
- सत्रहवीं सदी की शुरुआत, लगभग 1610 के दशक में
इस कथा की लंका
- सुंदरकांड पूरा कवित्त छंद में है, और बाग़ उजड़ने से सीधे लंका दहन पर पहुँचता है।
- मानस में जो आग कुछ पंक्तियों में है, वह यहाँ बहुत फैलकर कही गई है।
- आग लंका के लोगों की आँख से दिखती है: रानियाँ "पानी! पानी!" पुकारती हैं, और मंदोदरी कहती हैं कि किसी ने उनकी बात नहीं मानी।
आज: आज भी ख़ूब छपती है; इसके हनुमान वाले पद, हनुमान बाहुक, अलग से पढ़े जाते हैं।
सुंदरकांड के पल, इस कथा में
खेल में लंका की किसी जगह पर पहुँचकर वही पल दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है। यह कथा उन पलों को ऐसे कहती है।
पुष्पक के भीतर
पहली रात: खोज
यहाँ पुष्पक का ठाठ नहीं दिखता, दिखती है वह आग जो आगे लगनी है।
आग छत से छत तक पहुँचती है, और नगर का सोना पिघलकर बहने लगता है।
जो सजावट अभी सामने है, वह थोड़ी देर में राख हो जाएगी।
रत्न गिनने का वक़्त किसी के पास नहीं, गिनती जली हुई चीज़ों की होती है।
सजावट का पूरा ब्योरा वाल्मीकि में है, और शास्त्री की यात्रा में वह पूरा खुलता है।
कवितावली, तुलसीदासनगर का चौक
दूसरा दिन: आग
सज़ा देने वाले ही घिर जाते हैं, और तमाशा पलट जाता है।
एक साँस में तमाशा ख़त्म, और अगली साँस में पूरा चौक भाग रहा है।
रस्सियाँ हाथ से छूट जाती हैं, और जो पकड़ने आए थे वही पीछे भागते हैं।
चौक के बीच रखा ढोल लुढ़ककर एक ओर चला जाता है।
बाद में मंदोदरी का रोना भी इसी ज़ोर से आता है, और वही सबसे याद रह जाता है।
कवितावली, तुलसीदास, ब्रजभाषाजलती छतें
दूसरा दिन: आग
पूँछ की लपटें इतनी बड़ी हैं कि छतों से ऊपर उठ जाती हैं।
देखने वालों को लगता है मानो काल ने पूरी लंका को निगलने के लिए जीभ फैला दी हो।
धुआँ इतना है कि ऊपर का चाँद भी लाल दिखने लगता है।
जलती लकड़ी चटकती है, और उसकी आवाज़ गली गली तक जाती है।
बाज़ार, रास्ते, गढ़, गली और अटारी, आग एक के बाद एक सब पर उतरती जाती है।
कवितावली, सुंदर काण्ड और लंका काण्डइस कथा से खेल के पत्ते
खेल में ये पत्ते इसी कथा से खुलते हैं। हर पत्ते में एक ऐसी बात है जो बहुत कम लोगों ने सुनी है।
उपन्यास
यह कथा उनतालीस लंकाओं में से एक है। इन्हीं लंकाओं पर मनु विश्रांति की उपन्यास गाथा बनी है: उनतालीस लंकाएँ।
कवितावली इन त्योहारों के पन्नों पर भी आती है, उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 में: तुलसीदास जयंती। ये दिन, और साल का हर त्योहार और व्रत, एक बार दबाकर अपने फ़ोन के कैलेंडर में: Manu Vishranti Calendar जोड़ें।