आज · दिन का पंचांग · विक्रम संवत 2084 · चैत्र
16 अप्रैल 2027 का पंचांग
शुक्रवार · चैत्र शुक्ल दशमी
16 अप्रैल 2027, शुक्रवार को चैत्र शुक्ल दशमी है, सुबह 11:22 तक; उसके बाद एकादशी। नक्षत्र आश्लेषा है, सुबह 8:18 तक। सूर्योदय सुबह 5:55 और सूर्यास्त शाम 6:47। राहु काल सुबह 10:45 से दोपहर 12:21 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
पंचांग
16 अप्रैल 2027 का पंचांग: तिथि, नक्षत्र, योग, करण
- तिथि
- चैत्र शुक्ल दशमीसुबह 11:22 तक, फिर एकादशी
- नक्षत्र
- आश्लेषासुबह 8:18 तक, फिर मघा
- योग
- गंड17 अप्रैल, रात 2:58 तक, फिर वृद्धि
- करण
- गरसुबह 11:22 तक
- वार
- शुक्रवार
- पक्ष
- शुक्ल पक्ष
- महीना
- चैत्र (पूर्णिमांत)अमांत गिनती में भी यही
- संवत
- विक्रम संवत 2084
- चंद्र राशि
- कर्कसूर्योदय के समय
- सूर्य राशि
- मेष
- सूर्योदय
- सुबह 5:55
- सूर्यास्त
- शाम 6:47
- चंद्रोदय
- दोपहर 2:18
- चंद्रास्त
- रात 2:50
मुहूर्त
इस दिन के शुभ मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त
- सुबह 4:19 से सुबह 5:07 तकसूर्योदय से पहले के 96 से 48 मिनट: ध्यान, पाठ और पढ़ाई का समय।
- अभिजित मुहूर्त
- सुबह 11:56 से दोपहर 12:47 तकदिन के ठीक बीच का मुहूर्त, नए काम के लिए अच्छा माना जाता है।
- विजय मुहूर्त
- दोपहर 2:30 से दोपहर 3:21 तकदिन के पंद्रह हिस्सों में ग्यारहवाँ।
इस दिन कब न शुरू करें
- राहु काल
- सुबह 10:45 से दोपहर 12:21 तकइस समय नया काम शुरू नहीं करते।
- यमगंड
- दोपहर 3:34 से शाम 5:11 तकइसे भी शुभ काम के लिए टालते हैं।
- गुलिक काल
- सुबह 7:32 से सुबह 9:08 तकदक्षिण भारत में इसे भी देखते हैं।
सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट का फ़र्क़ होगा। अप्रैल 2027 का पूरा महीना
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
कोई व्रत, कोई त्योहार अब छूटेगा नहीं
आज से दिसंबर 2027 तक के 334 त्योहार और व्रत, तिथि और मुहूर्त के साथ, सीधे आपके फ़ोन के कैलेंडर में। हर त्योहार के साथ उसका शुभकामना कार्ड भी, अपनों को WhatsApp पर भेजने के लिए। एक बार दबाइए, बस।
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- मुफ़्त
- कोई साइन अप नहीं
- नाम, नंबर या ईमेल नहीं
- जब चाहें हटा दें
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इस दिन की रामकथा
कूर्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण
संस्कृत · उनतालीस में से एक
छाया वाली सीता की कथा का पुराना स्रोत। रावण के आने पर अग्नि असली सीता को अपने पास रख लेते हैं, और रावण उनकी छाया ले जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में यही छाया आगे वेदवती से जुड़ती है। यह विचार अध्यात्म रामायण और मानस तक पहुँचा।