आज · दिन का पंचांग · विक्रम संवत 2084 · पौष
31 दिसंबर 2027 का पंचांग
शुक्रवार · पौष शुक्ल तृतीया
31 दिसंबर 2027, शुक्रवार को पौष शुक्ल तृतीया है, सुबह 8:12 तक; उसके बाद चतुर्थी। नक्षत्र श्रवण है, दोपहर 1:06 तक। सूर्योदय सुबह 7:13 और सूर्यास्त शाम 5:34। राहु काल सुबह 11:06 से दोपहर 12:24 तक है। इस दिन विनायक चतुर्थी है। समय नई दिल्ली के हैं।
पंचांग
31 दिसंबर 2027 का पंचांग: तिथि, नक्षत्र, योग, करण
- तिथि
- पौष शुक्ल तृतीयासुबह 8:12 तक, फिर चतुर्थी
- नक्षत्र
- श्रवणदोपहर 1:06 तक, फिर धनिष्ठा
- योग
- हर्षणसुबह 9:45 तक, फिर वज्र
- करण
- गरसुबह 8:12 तक
- वार
- शुक्रवार
- पक्ष
- शुक्ल पक्ष
- महीना
- पौष (पूर्णिमांत)अमांत गिनती में भी यही
- संवत
- विक्रम संवत 2084
- चंद्र राशि
- मकरसूर्योदय के समय
- सूर्य राशि
- धनु
- सूर्योदय
- सुबह 7:13
- सूर्यास्त
- शाम 5:34
- चंद्रोदय
- सुबह 9:29
- चंद्रास्त
- रात 8:46
मुहूर्त
इस दिन के शुभ मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त
- सुबह 5:37 से सुबह 6:25 तकसूर्योदय से पहले के 96 से 48 मिनट: ध्यान, पाठ और पढ़ाई का समय।
- अभिजित मुहूर्त
- दोपहर 12:03 से दोपहर 12:45 तकदिन के ठीक बीच का मुहूर्त, नए काम के लिए अच्छा माना जाता है।
- विजय मुहूर्त
- दोपहर 2:07 से दोपहर 2:49 तकदिन के पंद्रह हिस्सों में ग्यारहवाँ।
इस दिन कब न शुरू करें
- राहु काल
- सुबह 11:06 से दोपहर 12:24 तकइस समय नया काम शुरू नहीं करते।
- यमगंड
- दोपहर 2:59 से शाम 4:17 तकइसे भी शुभ काम के लिए टालते हैं।
- गुलिक काल
- सुबह 8:31 से सुबह 9:49 तकदक्षिण भारत में इसे भी देखते हैं।
सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट का फ़र्क़ होगा। दिसंबर 2027 का पूरा महीना
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
कोई व्रत, कोई त्योहार अब छूटेगा नहीं
आज से दिसंबर 2027 तक के 334 त्योहार और व्रत, तिथि और मुहूर्त के साथ, सीधे आपके फ़ोन के कैलेंडर में। हर त्योहार के साथ उसका शुभकामना कार्ड भी, अपनों को WhatsApp पर भेजने के लिए। एक बार दबाइए, बस।
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- मुफ़्त
- कोई साइन अप नहीं
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- जब चाहें हटा दें
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इस दिन की रामकथा
हिकायत सेरी राम
मलय · उनतालीस में से एक
मलय में लिखी रामकथा, हिकायत सेरी राम। हिकायत यानी सुनाई जाने वाली कहानी, इसलिए यह गद्य में है। यहाँ हनुमान सेरी राम के अपने बेटे हैं, और सीता सिति देवी। इसकी सबसे पुरानी पोथी 1633 से पहले की है, और केलंतान के छाया नाटक में इसके प्रसंग आज भी खेले जाते हैं।