सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में · भारत में
कृत्तिवासी रामायण
Krittivasi Ramayan
- भाषा बांग्ला
- किसकी कृत्तिवास ओझा, फुलिया
- कब पंद्रहवीं सदी, पाँचाली के ढंग में सात कांड
- कहाँ फुलिया, बंगाल
यह कथा
बांग्ला की वह रामकथा जो पयार छंद में, गाकर सुनाने के लिए लिखी गई। परंपरा कहती है कि गौड़ के एक राजा के कहने पर। यहाँ लंका की रक्षक लंकिनी नहीं, देवी चामुंडा हैं, जो हनुमान का नाम सुनते ही बिना लड़े कैलाश चली जाती हैं।
एक नज़र में
कृत्तिवासी रामायण, अपनी लिपि में
কৃত্তিবাসী রামায়ণ
- लिपि
- बांग्ला लिपि
- रूप
- सात कांड, पयार छंद में, गाकर सुनाई जाने वाली पाँचाली
- समय
- पंद्रहवीं सदी; पहली छपाई 1802 में श्रीरामपुर से
इस कथा की लंका
- लंका की रक्षक यहाँ लंकिनी नहीं, देवी चामुंडा हैं; हनुमान जी का नाम सुनते ही वे जान जाती हैं कि उनका समय पूरा हुआ, और कैलाश चली जाती हैं। कोई लड़ाई नहीं।
- सुंदरकांड जाम्बवान के सुनाए हनुमान जी के जन्म की कथा से खुलता है।
- लंका जलाने के बाद हनुमान जी फिर सीता जी के पास जाते हैं, जैसे तुलसीदास में।
आज: बंगाल की सबसे जानी मानी रामायण; घरों में आज भी पढ़ी और गाई जाती है।
सुंदरकांड के पल, इस कथा में
खेल में लंका की किसी जगह पर पहुँचकर वही पल दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है। यह कथा उन पलों को ऐसे कहती है।
उत्तर का फाटक
पहली रात: खोज
इस कथा में लंका की रखवाली कोई राक्षसी नहीं, ख़ुद देवी चामुंडा करती हैं।
ब्रह्मा ने उन्हें यहाँ लंका की रखवाली के लिए रखा था।
हनुमान का नाम सुनते ही वे बिना लड़े रास्ता छोड़ देती हैं।
वे लंका छोड़कर कैलाश चली जाती हैं, और फाटक खुला रह जाता है।
बंगाल के घर घर की देवी का यही नाम सुनने वालों को पहले से जाना पहचाना लगता है।
कृत्तिवासी रामायण, सुंदरकांडदो रास्तों का चौराहा
पहली रात: खोज
रास्ता चुनते हुए वे ऐसे सोचते हैं जैसे घर का कोई आदमी सोच रहा हो।
तीनों रास्तों में से बीच वाला सबसे चौड़ा है, और सबसे ज़्यादा रोशन भी।
चौराहे पर खड़े होकर वे तीनों रास्ते देखते हैं, और एक पर पहरेदारों की आवाज़ें आती हैं।
वे उसी रास्ते को छोड़कर उस तरफ़ मुड़ जाते हैं जिधर से फूलों की गंध आ रही है।
उसी ढंग से वह पूरे बंगाल में फैली, और आज भी वहाँ घर घर में जानी जाती है।
कृत्तिवासी रामायण, सुंदरकांडमधुवन के बंदर
तीसरा हिस्सा: ख़बर
बांग्ला कथा घर में सुनाने के लिए लिखी गई थी।
उसे श्रीराम पांचाली कहते हैं, यानी वह पढ़ने से ज़्यादा सुनाने के लिए बनी।
शहद के मटके फूटते हैं, और मीठी धार ज़मीन पर बहने लगती है।
कोई पेड़ पर चढ़कर नीचे फेंकता है, कोई नीचे खड़ा होकर मुँह खोले रहता है।
यहाँ भी बंदर उसी बाग़ में टूट पड़ते हैं, और रखवाले उन्हें रोक नहीं पाते।
कृत्तिवासी रामायण, सुंदरकांडनगर की गलियाँ
पहली रात: खोज
बांग्ला की इस कथा में नगर घर जैसा दिखता है। गलियों में दरवाज़े हैं, आँगन हैं, और भीतर से बातचीत की आवाज़ें आती हैं।
द्वार पर रोकने वाली को हराकर वे अभी अभी भीतर आए हैं, इसलिए यहाँ का हर कदम सँभलकर पड़ता है।
किसी दरवाज़े पर अल्पना बनी है, और किसी के बाहर जूते उतरे रखे हैं।
एक घर में कोई खाँसता है, और उसकी आवाज़ पूरी गली में जाती है।
यहाँ राक्षसों का नगर डरावना कम, अपने जैसा ज़्यादा लगता है।
इस कथा के 2 और पल खेल के भीतर पढ़े जा सकते हैं: आम घरों की गली, सारला की अपनी ज़बान।
इस कथा से खेल के पत्ते
खेल में ये पत्ते इसी कथा से खुलते हैं। हर पत्ते में एक ऐसी बात है जो बहुत कम लोगों ने सुनी है।
उपन्यास
इस कथा की लंका, उपन्यास में
मनु विश्रांति की उपन्यास गाथा उनतालीस लंकाएँ इस कथा की लंका में उतरती है। तीनों खंड लिखे जा चुके हैं, और प्रकाशन की तैयारी में हैं।
खंड 2, पानी पर आग: इस बार पूरी तैयारी है।- सदियों का एक मेहमान: बिनय, नदिया, 1843। खंड 2, पानी पर आग
कृत्तिवासी रामायण इन त्योहारों के पन्नों पर भी आती है, उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 में: दुर्गा पूजा, दुर्गा अष्टमी। ये दिन, और साल का हर त्योहार और व्रत, एक बार दबाकर अपने फ़ोन के कैलेंडर में: Manu Vishranti Calendar जोड़ें।
सुंदरकांड पर और
यही पल, सारी रामकथाओं में एक साथ: