आज · दिन का पंचांग · विक्रम संवत 2084 · वैशाख
21 अप्रैल 2027 का पंचांग
बुधवार · वैशाख कृष्ण प्रतिपदा
21 अप्रैल 2027, बुधवार को वैशाख कृष्ण प्रतिपदा है, 22 अप्रैल, रात 3:31 तक; उसके बाद द्वितीया। नक्षत्र स्वाती है, 22 अप्रैल, सुबह 4:44 तक। सूर्योदय सुबह 5:50 और सूर्यास्त शाम 6:50। राहु काल दोपहर 12:20 से दोपहर 1:58 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
पंचांग
21 अप्रैल 2027 का पंचांग: तिथि, नक्षत्र, योग, करण
- तिथि
- वैशाख कृष्ण प्रतिपदा22 अप्रैल, रात 3:31 तक, फिर द्वितीया
- नक्षत्र
- स्वाती22 अप्रैल, सुबह 4:44 तक, फिर विशाखा
- योग
- वज्रशाम 4:10 तक, फिर सिद्धि
- करण
- बालवदोपहर 3:40 तक
- वार
- बुधवार
- पक्ष
- कृष्ण पक्ष
- महीना
- वैशाख (पूर्णिमांत)चैत्र (अमांत, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण में)
- संवत
- विक्रम संवत 2084
- चंद्र राशि
- तुलासूर्योदय के समय
- सूर्य राशि
- मेष
- सूर्योदय
- सुबह 5:50
- सूर्यास्त
- शाम 6:50
- चंद्रोदय
- शाम 7:29
- चंद्रास्त
- सुबह 5:38
मुहूर्त
इस दिन के शुभ मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त
- सुबह 4:14 से सुबह 5:02 तकसूर्योदय से पहले के 96 से 48 मिनट: ध्यान, पाठ और पढ़ाई का समय।
- अभिजित मुहूर्त
- सुबह 11:54 से दोपहर 12:46 तकदिन के ठीक बीच का मुहूर्त, नए काम के लिए अच्छा माना जाता है। बुधवार को इसे नहीं लेते।
- विजय मुहूर्त
- दोपहर 2:30 से दोपहर 3:22 तकदिन के पंद्रह हिस्सों में ग्यारहवाँ।
इस दिन कब न शुरू करें
- राहु काल
- दोपहर 12:20 से दोपहर 1:58 तकइस समय नया काम शुरू नहीं करते।
- यमगंड
- सुबह 7:28 से सुबह 9:05 तकइसे भी शुभ काम के लिए टालते हैं।
- गुलिक काल
- सुबह 10:43 से दोपहर 12:20 तकदक्षिण भारत में इसे भी देखते हैं।
सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट का फ़र्क़ होगा। अप्रैल 2027 का पूरा महीना
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
कोई व्रत, कोई त्योहार अब छूटेगा नहीं
आज से दिसंबर 2027 तक के 334 त्योहार और व्रत, तिथि और मुहूर्त के साथ, सीधे आपके फ़ोन के कैलेंडर में। हर त्योहार के साथ उसका शुभकामना कार्ड भी, अपनों को WhatsApp पर भेजने के लिए। एक बार दबाइए, बस।
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- मुफ़्त
- कोई साइन अप नहीं
- नाम, नंबर या ईमेल नहीं
- जब चाहें हटा दें
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इस दिन की रामकथा
रंगनाथ रामायण
तेलुगु, द्विपद छंद · उनतालीस में से एक
तेलुगु की पहली पूरी रामायण, द्विपद छंद में, जिसे गाकर सुनाया जाता है। इसीलिए यह दरबार की नहीं, लोगों की कथा लगती है। इसमें कई लोक प्रसंग जुड़े हैं, जैसे पुल बनाने में मदद करने वाली गिलहरी, और आज भी चमड़े की कठपुतलियों वाले नाटक इसके द्विपद गाते हैं।