पंचांग 2027

उपनिषदों के प्रसिद्ध वाक्य · कठोपनिषद्

उत्तिष्ठत जाग्रत

उठो, जागो

यह वाक्य कठोपनिषद् का है, पहले अध्याय की तीसरी वल्ली का चौदहवाँ मंत्र। इसे यम, यानी मृत्यु के देवता, बालक नचिकेता से कहते हैं: उठो, जागो, और जो श्रेष्ठ हैं उनके पास जाकर समझो, क्योंकि यह रास्ता छुरे की धार जैसा है।

कठोपनिषद् १.३.१४ · यम, नचिकेता से

पूरा मंत्र

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥

कठोपनिषद् १.३.१४

उठो, जागो, और श्रेष्ठ जनों के पास जाकर समझो। ज्ञानी कहते हैं, यह रास्ता छुरे की तेज़ धार जैसा है, जिस पर चलना कठिन है।

मंत्र का पाठ शृंगेरी की अद्वैत शारदा वाली मूल प्रति से है, और GRETIL की प्रति से मिलाया गया है। दोनों में अक्षर एक ही हैं, GRETIL बस शब्दों को अलग अलग लिखता है, जैसे वरान् निबोधत।

हर शब्द का अर्थ

उत्तिष्ठत
उठो
जाग्रत
जागो
प्राप्य वरान्
श्रेष्ठ जनों के पास जाकर
निबोधत
समझो, जानो
क्षुरस्य धारा
छुरे की धार
निशिता
तेज़ की हुई
दुरत्यया
जिसे पार करना कठिन है
दुर्गं पथः
कठिन रास्ता
तत् कवयः वदन्ति
ज्ञानी ऐसा कहते हैं

किसने, किससे, कब

कठोपनिषद् की कथा में बालक नचिकेता यम के घर पहुँचता है और तीन रातें बिना खाए इंतज़ार करता है। यम उसे तीन वर देते हैं। तीसरे वर में नचिकेता पूछता है कि मरने के बाद क्या होता है, और यम का उत्तर ही यह उपनिषद् है।

इस मंत्र से पहले, उसी तीसरी वल्ली में, यम एक रथ की बात करते हैं: शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है, और मन लगाम। फिर वे इंद्रियों से ऊपर उठते हुए एक सीढ़ी बताते हैं, और उसके बाद यह मंत्र आता है, एक पुकार की तरह।

उपनिषद् ख़ुद इस कथा को मृत्युप्रोक्तम् कहता है, यानी मृत्यु की कही हुई (कठोपनिषद् १.३.१६)।

और जानने की बातें

संख्या कहीं कहीं ३.१४ क्यों छपी मिलती है

कठोपनिषद् दो अध्यायों में है, और हर अध्याय में तीन वल्लियाँ। कुछ छपाइयाँ छहों वल्लियों को लगातार गिनती हैं, तब यही मंत्र ३.१४ बन जाता है। अध्याय और वल्ली, दोनों गिनें तो यह १.३.१४ है, और शंकराचार्य की टीका वाली प्रति इसी तरह छापती है।

अंग्रेज़ी में यह कैसे मिलता है

अंग्रेज़ी में यह अक्सर Arise, awake, and stop not till the goal is reached के रूप में मिलता है। वह इस मंत्र का खुला अनुवाद है। मंत्र में लक्ष्य तक न रुकने की बात सीधे नहीं है। उसमें उठने, जागने और श्रेष्ठ जनों से सीखने की बात है, और यह चेतावनी कि रास्ता छुरे की धार जैसा है।

नेति नेति, एक ध्यान डायरी

यह उपनिषद्, इस डायरी में

नेति नेति डायरी इसी मंत्र पर ख़त्म होती है, आख़िर में, एक सुबह। डायरी के ग्रंथों में कठोपनिषद् के बारे में लिखा है: ऊपर दिया अर्थ डायरी का अपना है।

बालक नचिकेता और यम की बातचीत।

डायरी में कठोपनिषद् इन अध्यायों के सामने रखा गया: पहला भाग, जो काल के बाहर खड़े हैं, तीसरा भाग, आत्मा, तीसरा भाग, तरंग, चौथा भाग, कोष।

नेति नेति डायरी देखिए

सवाल जवाब

पूछे जाने वाले सवाल

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत का अर्थ क्या है?

उठो, जागो, और श्रेष्ठ जनों के पास जाकर समझो। ज्ञानी कहते हैं, यह रास्ता छुरे की तेज़ धार जैसा है, जिस पर चलना कठिन है।

उत्तिष्ठत जाग्रत किस ग्रंथ से है?

कठोपनिषद् से। यह पहले अध्याय की तीसरी वल्ली का चौदहवाँ मंत्र है, कठोपनिषद् १.३.१४।

यह मंत्र किसने किससे कहा?

यम ने, यानी मृत्यु के देवता ने, बालक नचिकेता से। उपनिषद् ख़ुद इस कथा को मृत्युप्रोक्तम् कहता है, मृत्यु की कही हुई।

क्या Arise, awake, and stop not till the goal is reached इसी मंत्र से है?

हाँ, वह इसी मंत्र का खुला अंग्रेज़ी अनुवाद है। मूल मंत्र में उठने, जागने और श्रेष्ठ जनों के पास जाकर समझने की बात है, और यह कि रास्ता छुरे की धार जैसा है।

क्षुरस्य धारा का मतलब क्या है?

छुरे की धार। मंत्र कहता है कि ज्ञानियों के अनुसार यह रास्ता छुरे की तेज़ धार जैसा है, जिसे पार करना कठिन है।

कुछ किताबों में इसकी संख्या ३.१४ क्यों है?

क्योंकि वे कठोपनिषद् की छहों वल्लियों को लगातार गिनती हैं। अध्याय और वल्ली के हिसाब से यही मंत्र १.३.१४ है।