नेति नेति · उपनिषदों से
उपनिषदों के प्रसिद्ध वाक्य
हर वाक्य अपने पूरे मंत्र और सही संख्या के साथ
कुछ वाक्य इतने जाने पहचाने हैं कि उनका स्रोत पीछे छूट जाता है। यहाँ उपनिषदों के पाँच ऐसे वाक्य हैं, हर एक अपने पूरे मंत्र, सही संख्या, बोलने वाले और आसान अर्थ के साथ। ये चारों उपनिषद्, कठ, मुण्डक, छान्दोग्य और बृहदारण्यक, नेति नेति डायरी में आते हैं।
पाँच वाक्य
- कठोपनिषद् १.३.१४उत्तिष्ठत जाग्रतउत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधतउठो, जागो
- मुण्डक उपनिषद् ३.१.६सत्यमेव जयतेसत्यमेव जयते नानृतंसच की ही जीत होती है
- छान्दोग्य उपनिषद् ६.८.७तत् त्वम् असितत्त्वमसि श्वेतकेतोतुम वही हो
- बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१०अहं ब्रह्मास्मितदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीतिमैं ब्रह्म हूँ
- बृहदारण्यक उपनिषद् २.३.६नेति नेतिअथात आदेशो नेति नेतियह नहीं, यह नहीं
एक नज़र में
| वाक्य | उपनिषद् | वेद | संख्या | किसने, किससे |
|---|---|---|---|---|
| उत्तिष्ठत जाग्रत | कठोपनिषद् | कृष्ण यजुर्वेद | १.३.१४ | यम, नचिकेता से |
| सत्यमेव जयते | मुण्डक उपनिषद् | अथर्ववेद | उपनिषद् ३.१.६ | ऋषि अंगिरा, शौनक से |
| तत् त्वम् असि | छान्दोग्य उपनिषद् | सामवेद | उपनिषद् ६.८.७ | उद्दालक आरुणि, अपने बेटे श्वेतकेतु से |
| अहं ब्रह्मास्मि | बृहदारण्यक उपनिषद् | शुक्ल यजुर्वेद | उपनिषद् १.४.१० | किसी से नहीं, उपनिषद् ख़ुद बताता है |
| नेति नेति | बृहदारण्यक उपनिषद् | शुक्ल यजुर्वेद | उपनिषद् २.३.६ | उपनिषद् का उपदेश; बाद में याज्ञवल्क्य, राजा जनक और मैत्रेयी से |
सवाल जवाब
पूछे जाने वाले सवाल
उपनिषदों के सबसे प्रसिद्ध वाक्य कौन से हैं?
उत्तिष्ठत जाग्रत (कठोपनिषद् १.३.१४), सत्यमेव जयते (मुण्डक उपनिषद् ३.१.६), तत् त्वम् असि (छान्दोग्य उपनिषद् ६.८.७), अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१०) और नेति नेति (बृहदारण्यक उपनिषद् २.३.६)। हर एक का पूरा मंत्र और अर्थ इस पन्ने से जुड़ा है।
महावाक्य कौन से हैं?
अद्वैत वेदांत की परंपरा चार वाक्यों को महावाक्य कहती है, चार वेदों से एक एक: प्रज्ञानं ब्रह्म ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद् से, अहं ब्रह्मास्मि यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद् से, तत् त्वम् असि सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद् से, और अयमात्मा ब्रह्म अथर्ववेद के माण्डूक्य उपनिषद् से।
एक ही मंत्र की संख्या अलग अलग किताबों में अलग क्यों मिलती है?
क्योंकि किताबें अलग ढंग से गिनती हैं। कठोपनिषद् का उत्तिष्ठत जाग्रत अध्याय और वल्ली के हिसाब से १.३.१४ है, पर जो छपाई छहों वल्लियों को लगातार गिनती है, उसमें ३.१४। बृहदारण्यक उपनिषद् के काण्व और माध्यंदिन पाठ की गिनती भी अलग है। यहाँ हर संख्या शंकराचार्य की टीका वाले पाठ के हिसाब से है।
इन वाक्यों का पाठ कहाँ से लिया गया है?
शृंगेरी की अद्वैत शारदा वाली मूल प्रतियों से, और हर मंत्र को कम से कम एक और प्रति से मिलाकर। हर पन्ने के नीचे स्रोत दिए हैं।