सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में · भारत के बाहर
सिद्धि रामायण
Siddhi Ramayan
- भाषा नेपाल भाषा
- किसकी सिद्धिदास महाजु
- कब बीसवीं सदी की शुरुआत
- कहाँ काठमांडू घाटी
यह कथा
नेपाल भाषा यानी नेवारी में लिखी रामकथा, जिसे सिद्धिदास महाजु ने बीसवीं सदी की शुरुआत में रचा। नेपाल में एक ही समय कई भाषाएँ चलती हैं, और यह उस दूसरी भाषा की रामकथा है, भानुभक्त वाली नेपाली से अलग। एक ही देश, दो ज़बानें, और दोनों में अपनी अपनी रामकथा।
एक नज़र में
सिद्धि रामायण, अपनी लिपि में
सिद्धि रामायण
- लिपि
- देवनागरी, नेपाल भाषा (नेवारी)
- रूप
- नेपाल भाषा में पद्य रामायण
- समय
- सन 1913 में रचा; छपा 2010 में
इस कथा की लंका
- नेपाल भाषा के जागरण की एक बड़ी रचना; कवि को "महाकवि" कहा जाता है और 1980 में उन पर डाक टिकट भी निकला।
- लिखी 1913 में गई, पर छपने में लगभग सौ बरस लगे।
सुंदरकांड के पल, इस कथा में
खेल में लंका की किसी जगह पर पहुँचकर वही पल दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है। यह कथा उन पलों को ऐसे कहती है।
इस कथा के 2 और पल खेल के भीतर पढ़े जा सकते हैं: आसमान में लौटती टोली, वाटिका का कोना।
इस कथा से खेल के पत्ते
खेल में ये पत्ते इसी कथा से खुलते हैं। हर पत्ते में एक ऐसी बात है जो बहुत कम लोगों ने सुनी है।
उपन्यास
यह कथा उनतालीस लंकाओं में से एक है। इन्हीं लंकाओं पर मनु विश्रांति की उपन्यास गाथा बनी है: उनतालीस लंकाएँ।