सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में · भारत में
रामायण कल्पवृक्षम्
Ramayana Kalpavrukshamu
- भाषा तेलुगु
- किसकी विश्वनाथ सत्यनारायण
- कब बीसवीं सदी
- कहाँ आंध्र
यह कथा
तेलुगु की वह रामकथा जिसे विश्वनाथ सत्यनारायण ने बीसवीं सदी में रचा और जिसका नाम है रामायण कल्पवृक्षम्। यह उस समय लिखी गई जब लोग कह रहे थे कि अब पुरानी कथाओं का ज़माना गया। कवि ने वही कथा दोबारा कही, अपने ढंग से, और उसी पर उन्हें ज्ञानपीठ मिला। यह बताता है कि यह कथा किसी पुरानी सदी में बंद नहीं हुई।
एक नज़र में
रामायण कल्पवृक्षम्, अपनी लिपि में
శ్రీమద్రామాయణ కల్పవృక్షము
- लिपि
- तेलुगु लिपि
- रूप
- छह कांड का महाकाव्य, पुराने तेलुगु छंदों में
- समय
- 1933 के आसपास शुरू, 1962 तक पूरा; 1970 का ज्ञानपीठ
इस कथा की लंका
- वाल्मीकि की कथा, पर कवि के अपने ढंग से: किरदारों के मन और कारण बदलते हैं।
- आलोचक कहते हैं कि यहाँ राम आदर्श मनुष्य से ज़्यादा भगवान हैं।
- पूरी रचना में लगभग तीस बरस लगे; बीसवीं सदी में भी रामकथा नई लिखी जा रही थी।
आज: तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ने इसे फिर छापा है, और यह आज भी पढ़ी पढ़ाई जाती है।
सुंदरकांड के पल, इस कथा में
खेल में लंका की किसी जगह पर पहुँचकर वही पल दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है। यह कथा उन पलों को ऐसे कहती है।
प्रस्रवण की चढ़ाई
तीसरा हिस्सा: ख़बर
चढ़ाई तेज़ है, और साँस पहले ही भारी हो चुकी है।
थकान है, जल्दी भी है, और उन दोनों के बीच एक अजीब हल्कापन।
चढ़ते हुए वे सोचते हैं कि कहना कहाँ से शुरू करें, और यही सोच उन्हें सबसे ज़्यादा थकाती है।
पैर अपने आप चलते हैं, और मन आगे पहुँचकर वापस लौट आता है।
यही उस कथा का ढंग है: बाहर जो हो रहा है, उसके साथ भीतर जो हो रहा है।
रामायण कल्पवृक्षम्, विश्वनाथ सत्यनारायणलौटती उड़ान
तीसरा हिस्सा: ख़बर
नीचे समंदर है और पीछे धुआँ, और ऊपर उड़ता हुआ वह अकेला अब हल्का है।
यहाँ उसके मन का हाल भी साथ चलता है: डर उतर चुका है और जल्दी बाक़ी है।
हवा सामने से आती है और आँखें बार बार मिचती हैं।
बीच बीच में वे नीचे देखते हैं, पर अब वहाँ कुछ देखने को नहीं बचा।
यह हाल ऐसे कहा गया है जैसे कोई आज अपने दिन का ब्योरा दे रहा हो।
रामायण कल्पवृक्षम्, विश्वनाथ सत्यनारायणइस कथा से खेल के पत्ते
खेल में ये पत्ते इसी कथा से खुलते हैं। हर पत्ते में एक ऐसी बात है जो बहुत कम लोगों ने सुनी है।
उपन्यास
यह कथा उनतालीस लंकाओं में से एक है। इन्हीं लंकाओं पर मनु विश्रांति की उपन्यास गाथा बनी है: उनतालीस लंकाएँ।