सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में · भारत में
कण्णस्स रामायणम्
Kannassa Ramayanam
- भाषा मलयालम
- किसकी निरणम राम पणिक्कर
- कब चौदहवीं सदी
- कहाँ निरणम, केरल
यह कथा
मलयालम की उस दौर की रामकथा जिसे निरणम के राम पणिक्कर ने चौदहवीं सदी में रचा, और जिसे कण्णस्स रामायणम् कहते हैं। एषुत्तच्छन से यह पुरानी है, और इसी तरह की रचनाओं ने उस भाषा को कथा कहने लायक बनाया। यह काम निरणम वाले कवियों के नाम से जाना जाता है।
एक नज़र में
कण्णस्स रामायणम्, अपनी लिपि में
കണ്ണശ്ശരാമായണം
- लिपि
- मलयालम लिपि
- रूप
- पाट्टु यानी गीत के रूप में, वाल्मीकि के सातों कांड
- समय
- चौदहवीं से पंद्रहवीं सदी
इस कथा की लंका
- मलयालम में वाल्मीकि की पूरी कथा, गीत के रूप में; सुंदरकांड वाल्मीकि के ही क्रम में चलता है।
- मलयालम साहित्य के इतिहास में यह रामचरितम् और एषुत्तच्छन के बीच की कड़ी माना जाता है।
आज: मध्य काल की मलयालम के क्लासिक के रूप में पढ़ा जाता है; 2013 में भाषा इंस्टिट्यूट ने टीका सहित छापा।
सुंदरकांड के पल, इस कथा में
खेल में लंका की किसी जगह पर पहुँचकर वही पल दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है। यह कथा उन पलों को ऐसे कहती है।
आम घरों की गली
पहली रात: खोज
गली के दोनों ओर घर हैं, और हर घर के आगे एक छोटा चबूतरा।
दीये जल रहे हैं, दरवाज़े बंद हैं, और भीतर से कोई आवाज़ नहीं आती।
कहीं कोई खाँसता है, और फिर वही चुप्पी लौट आती है।
इतनी सी बात में पूरी गली सामने खड़ी हो जाती है।
फिर भी वही कम शब्द उस गली को खड़ा कर देते हैं।
कण्णस्स रामायणम्, निरणम राम पणिक्करचैत्य महल
दूसरा दिन: आग
वे खंभा उखाड़ते हैं, आग लगती है, और पहरेदार गिरते चले जाते हैं।
ऊपर की मंज़िल से नीचे तक सब एक ही साँस में बीत जाता है।
ऊपर की मंज़िल से नीचे कूदते हुए वे मुड़कर देखते भी नहीं।
पीछे छत गिरती है, और उसकी आवाज़ पूरे मोहल्ले में सुनाई देती है।
कण्णस्स की मलयालम उस दौर की है जब भाषा नई थी, इसलिए यहाँ रफ़्तार ही ताक़त है।
कण्णस्स रामायणम्, निरणम राम पणिक्कर, चौदहवीं सदीइस कथा से खेल के पत्ते
खेल में ये पत्ते इसी कथा से खुलते हैं। हर पत्ते में एक ऐसी बात है जो बहुत कम लोगों ने सुनी है।
उपन्यास
यह कथा उनतालीस लंकाओं में से एक है। इन्हीं लंकाओं पर मनु विश्रांति की उपन्यास गाथा बनी है: उनतालीस लंकाएँ।